संकष्टी चतुर्थी व्रत — विघ्नहर्ता गणेश व्रत विधि, चंद्र अर्घ्य एवं महत्व
संकटों को हरने वाली पावन चतुर्थी — संतान रक्षा एवं समस्त कार्य सिद्धि
संकष्टी चतुर्थी व्रत — विघ्नहर्ता गणेश व्रत विधि, चंद्र अर्घ्य एवं महत्व (Audio)
संकष्टी चतुर्थी व्रत — विघ्नहर्ता गणेश व्रत विधि, चंद्र अर्घ्य एवं महत्व पाठ
गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम्।
उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्॥
उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्॥
गणेश ध्यान: जो समस्त विघ्नों के हर्ता, माता उमा के सुपुत्र और भक्तों के शोक का नाश करने वाले हैं, उन भगवान विघ्नेश्वर के चरण कमलों में हमारा प्रणाम।
संकष्टी चतुर्थी व्रत — विघ्नहर्ता गणेश व्रत विधि, चंद्र अर्घ्य एवं महत्व का महत्व एवं आध्यात्मिक लाभ
🐘 संकष्टी चतुर्थी का आध्यात्मिक भाव
‘संकष्टी’ का शाब्दिक अर्थ ही है “संकटों का हरण करने वाली”। कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी और शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहा जाता है। यदि यह चतुर्थी मंगलवार को पड़े तो इसे ‘अंगारकी संकष्टी’ कहते हैं, जिसका फल करोड़ों सूर्य ग्रहणों के बराबर पुण्यदायी माना गया है।
🌕 चंद्र दर्शन एवं अर्घ्य विधि
इस व्रत में चंद्र दर्शन का विशेष नियम है। दिनभर उपवास रहकर रात्रि में जब चंद्रोदय हो, तब तांबे या चांदी के लोटे में जल, दूध, चंदन, रोली और अक्षत मिलाकर चंद्रमा को अर्घ्य दें। इसके उपरांत भगवान गणेश को 21 मोदक व दूर्वा अर्पित कर व्रत का पारण करें।
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