मंत्र
महामृत्युंजय मंत्र — शुद्ध संस्कृत पाठ, संजीवनी अर्थ एवं साधना विधि
ऋग्वेद का दिव्य महामंत्र — अकाल मृत्यु निवारण और आरोग्य प्रदाता
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महामृत्युंजय मंत्र — शुद्ध संस्कृत पाठ, संजीवनी अर्थ एवं साधना विधि
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
सरल भावार्थ: हम त्रिनेत्रधारी भगवान शिव का ध्यान और पूजन करते हैं, जो सुगंधित (चेतन) और समस्त जगत का पोषण करने वाले हैं। जिस प्रकार पका हुआ खरबूजा बिना किसी कष्ट के अपनी बेल के बंधन से मुक्त हो जाता है, उसी प्रकार हम मृत्यु (जन्म-मरण के संसार बंधन) से मुक्त हों, किन्तु अमृत (मोक्ष एवं शिव तत्व) से कभी विमुख न हों।
🌿 मंत्र के प्रत्येक पद का गहरा अर्थ
- त्र्यम्बकम्: तीन नेत्रों वाले भगवान शिव (भूत, वर्तमान, भविष्य के ज्ञाता)
- यजामहे: हम ध्यान एवं आराधना करते हैं
- सुगन्धिम्: दिव्य चेतना रूपी सुगंध से युक्त
- पुष्टिवर्धनम्: शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक पुष्टि देने वाले
- उर्वारुकमिव: खरबूजे की भांति सहजता से
- बन्धनात्: संसार के बंधनों से
- मृत्योर्मुक्षीय: मृत्यु के भय से हमें मुक्त करें
- मा अमृतात्: अमृतत्व से हमें कभी अलग न करें
🔱 महामृत्युंजय साधना का महत्व
महर्षि मार्कण्डेय द्वारा सिद्ध यह महामंत्र संजीवनी विद्या का मूल आधार है। जब भी किसी व्यक्ति पर कोई गंभीर रोग, संकट अथवा अकाल मृत्यु का भय उपस्थित हो, तब भगवान शिव के सम्मुख रुद्राक्ष माला से 108 बार अथवा सवा लाख जप का संकल्प लेकर इस मंत्र का अनुष्ठान करने से निश्चित रूप से अभय और आरोग्य की प्राप्ति होती है।