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माँ गंगा की आरती — ॐ जय गंगे माता

माँ गंगा की प्रसिद्ध "ॐ जय गंगे माता" आरती का संपूर्ण पाठ, सरल भावार्थ, गंगा अवतरण कथा, भगवान शिव और भगीरथ प्रसंग, गंगा दशहरा व पूजन विधि।

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माँ गंगा की भव्य महाआरती — पावन गंगा तट पर सहस्र दीपकों, शंख-घंटियों और वैदिक ब्राह्मणों द्वारा संध्या महाआरती का अलौकिक दृश्य
मोक्षदायिनी माँ गंगा की संध्या महाआरती — पावन तटों पर प्रज्वलित सहस्र दीपमालाएं और भक्तिभाव में लीन श्रद्धालु

सनातन धर्म में पतितपावनी, मोक्षदायिनी और त्रिपथगा माँ गंगा की आराधना में “ॐ जय गंगे माता” आरती का सर्वोच्च स्थान है। नित्य प्रातः और संध्याकाल में इस पावन आरती का गायन करने से मनुष्य के त्रिविध ताप व कायिक-वाचिक-मानसिक पाप भस्म हो जाते हैं और जीवन में शांति व आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है।

🪔 ॐ जय गंगे माता — माँ गंगा की आरती

॥ श्री गंगा जी की आरती ॥

ॐ जय गंगे माता, श्री जय गंगे माता।
जो नर तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता॥
ॐ जय गंगे माता॥

चन्द्रसी जोत तुम्हारी, जल निर्मल आता।
शरण पड़े जो तेरी, सो नर तर जाता॥
ॐ जय गंगे माता॥

पुत्र सगर के तारे, सब जग को ज्ञाता।
कृपा दृष्टि तुम्हारी, त्रिभुवन सुख दाता॥
ॐ जय गंगे माता॥

एक ही बार जो नर, तेरी शरण आता।
यम की त्रास मिटाकर, परम गति पाता॥
ॐ जय गंगे माता॥

आरती मात तुम्हारी, जो जन नित गाता।
सेवक वही सहज में, मुक्ति को पाता॥
ॐ जय गंगे माता॥

ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता।
जो नर तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता॥
ॐ जय गंगे माता॥

📖 आरती का सरल भावार्थ

१. ॐ जय गंगे माता…: हे त्रिभुवनतारिणी माँ गंगे! आपकी नित्य जय हो। जो भी श्रद्धालु एकाग्रचित्त होकर आपके पावन स्वरूप का ध्यान करता है, वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी समस्त मनोवांछित फलों को प्राप्त करता है।

२. चन्द्रसी जोत तुम्हारी…: आपकी दिव्य ज्योति पूर्ण चंद्रमा के समान शीतल, धवल और आलोकित करने वाली है। आपका जल अमृततुल्य, निर्मल और पापों को धोने वाला है। जो भी जन दीनभाव से आपकी शरण में आ जाता है, वह भवसागर से सहज ही पार उतर जाता है।

३. पुत्र सगर के तारे…: आपने राजा सगर के साठ हजार शापग्रस्त पुत्रों का उद्धार कर उन्हें मोक्ष प्रदान किया था, यह संपूर्ण संसार भली-भांति जानता है। आपकी कृपामयी दृष्टि तीनों लोकों (स्वर्ग, मर्त्य और पाताल) के प्राणियों को परम आनंद व सुख प्रदान करने वाली है।

४. एक ही बार जो नर…: जो प्राणी जीवन में एक बार भी सच्चे हृदय से आपकी पावन धारा में स्नान करता है या आपकी शरण में आता है, उसके यमराज द्वारा दिए जाने वाले समस्त भय और यातनाएं समाप्त हो जाती हैं और वह परम गति को प्राप्त होता है।

५. आरती मात तुम्हारी…: हे जननी! जो भक्त नित्य-नियम से भक्तिभाव से आपकी यह पावन आरती गाता है, वह आपका निष्काम सेवक बनकर इसी जन्म में संसार के बंधनों से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करता है।

🙏 माँ गंगा की आरती का धार्मिक महत्त्व

भारतीय सनातन संस्कृति में गंगा केवल एक जलधारा नहीं, अपितु साक्षात ब्रह्मद्रव और जगन्माता हैं। पद्म पुराण, स्कन्द पुराण और महाभारत के वनपर्व में गंगा स्तुति और आरती का अतुलनीय माहात्म्य वर्णित है:

  • पापविनाशिनी शक्ति: मान्यता है कि गंगा का दर्शन करने से दृष्टि के दोष, स्पर्श करने से कायिक पाप, नाम-स्मरण से वाचिक पाप और स्नान व आरती से सात जन्मों के संचित पाप नष्ट हो जाते हैं।
  • मृत्युंजय व मोक्ष प्रदायिनी: गंगाजल की एक बूंद भी यदि मरणासन्न व्यक्ति के मुख में पड़ जाए, तो वह यमदूतों के भय से मुक्त होकर वैकुंठ या शिवलोक को गमन करता है।
  • पंचमहाभूतों की शुद्धि: गंगा आरती के समय प्रज्वलित घृत के दीप, कर्पूर, शंखध्वनि और घंटा-नाद से संपूर्ण वातावरण की नकारात्मकता दूर होती है और प्राणवायु शुद्ध होती है।

🌊 माँ गंगा का धार्मिक स्वरूप एवं प्रतीकात्मकता

पुराणों और शिल्पकला में माँ गंगा को अत्यंत दिव्य, शांत और करुणामयी देवी के रूप में निरूपित किया गया है:

  • मकर वाहिनी: देवी गंगा का वाहन ‘मकर’ (जल का पौराणिक शक्तिशाली जीव) है। मकर जलचरों का राजा है, जो इस बात का प्रतीक है कि माँ गंगा समस्त जलजीवों और प्रकृति की अधिष्ठात्री हैं।
  • चतुर्भुज स्वरूप: देवी गंगा श्वेत वस्त्र धारण करती हैं। वे अपने हाथों में अमृत से भरा कलश, श्वेत कमल, वरद मुद्रा और अभय मुद्रा धारण करती हैं, जो अमृतत्व, पवित्रता, आशीर्वाद और अभय दान के परिचायक हैं।
  • त्रिपथगा: माँ गंगा तीनों लोकों में प्रवाहित होने के कारण ‘त्रिपथगा’ कहलाती हैं—स्वर्ग में ‘मंदाकिनी’, पृथ्वी पर ‘भागीरथी/गंगा’ और पाताल में ‘भोगवती’।

राजा भगीरथ की घोर तपस्या और हिमालय में माँ गंगा का स्वर्ग से धरा पर पावन अवतरण
राजा भगीरथ की अनन्य तपस्या — पूर्वजों के उद्धार हेतु ब्रह्मलोक से माँ गंगा का हिमालय में पावन अवतरण

📜 गंगा अवतरण की पावन कथा

पौराणिक आख्यानों के अनुसार, माँ गंगा मूलतः ब्रह्मलोक में भगवान ब्रह्मा के कमंडल में निवास करती थीं। जब भगवान विष्णु ने वामनावतार में अपने चरण से ब्रह्मांड को नापा, तब ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु के पावन अंगूठे को धोकर उस चरणामृत को अपने कमंडल में सुरक्षित कर लिया था। यही दिव्य चरणामृत ‘गंगा’ कहलाया।

इक्ष्वाकु वंश के चक्रवर्ती राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान किया। देवराज इंद्र ने ईर्ष्यावश उस यज्ञ के अश्व को चुराकर पाताल लोक में तपस्यारत महर्षि कपिल के आश्रम में बांध दिया। राजा सगर के साठ हजार पुत्र अश्व खोजते हुए वहां पहुंचे और महर्षि कपिल को चोर समझकर उनका अपमान करने लगे। महर्षि ने जैसे ही क्रुद्ध होकर अपनी आंखें खोलीं, उनके तपोबल के तेज से सगर के समस्त 60,000 पुत्र भस्म होकर शापग्रस्त हो गए। उनकी आत्माएं बिना तर्पण के भटकती रहीं।

🙏 राजा भगीरथ की तपस्या और ‘भागीरथी’ का नामकरण

सगर के वंश में आगे चलकर राजा अंशुमान और राजा दिलीप ने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए कठोर तप किया, किंतु उन्हें सफलता नहीं मिली। अंततः राजा दिलीप के पुत्र महाराज भगीरथ ने राजपाट त्यागकर हिमालय के गोमुख क्षेत्र में घोर तपस्या प्रारंभ की।

भगीरथ के अप्रतिम संकल्प से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी प्रकट हुए और बोले—“हे भगीरथ! मैं गंगा को पृथ्वी पर भेजने को तत्पर हूँ, किंतु गंगा के स्वर्ग से उतरने का वेग इतना प्रचंड होगा कि संपूर्ण पृथ्वी रसातल में समा जाएगी। इस वेग को केवल देवाधिदेव महादेव शिव ही अपनी जटाओं में थाम सकते हैं।”

भगीरथ ने पुनः भगवान शिव की कठोर आराधना की। शिवजी ने भगीरथ के भक्तिभाव से संतुष्ट होकर गंगा के अवतरण को अपनी जटाओं में स्वीकार करने का वरदान दिया। भगीरथ के इस असाधारण प्रयास के कारण ही गंगा को ‘भागीरथी’ कहा गया, और हिंदी साहित्य में किसी असंभव कार्य को सिद्ध करने के लिए ‘भगीरथ प्रयास’ का मुहावरा अमर हो गया।

भगवान शिव की जटाओं में माँ गंगा का अवतरण — गंगा के प्रचंड वेग को नियंत्रित करते गंगाधर महादेव
गंगाधर महादेव — माँ गंगा के प्रचंड वेग को अपनी पावन जटाओं में धारण कर जगत का कल्याण करते शिव

🔱 भगवान शिव और गंगा (गंगाधर स्वरूप)

जब माँ गंगा स्वर्गलोक से तीव्र गर्जना और असीम वेग के साथ नीचे उतरीं, तब उनके मन में यह अभिमान जागृत हुआ कि वे भगवान शिव को भी अपने प्रवाह में बहा ले जाएंगी। अंतर्यामी भगवान शिव ने उनके गर्व को नष्ट करने हेतु अपनी जटाओं को विस्तृत कर दिया।

गंगा स्वर्ग से सीधे शिवजी की जटाओं में समा गईं और वर्षों तक उसी भूलभुलैया में घूमती रहीं, किंतु बाहर निकलने का मार्ग न पा सकीं। गंगा का अहंकार चूर-चूर हो गया। तब राजा भगीरथ ने पुनः भगवान आशुतोष की प्रार्थना की। दयालु शिवजी ने अपनी एक लट को खोलकर गंगा को शांत, निर्मल और कल्याणकारी धाराओं में पृथ्वी पर प्रवाहित किया। भगवान शिव का यह रूप सनातन धर्म में ‘गंगाधर’ नाम से पूजित हुआ।

गंगा पूजा एवं दीपदान — पावन तट पर गंगाजल में अर्घ्य समर्पण और दीपोत्सर्ग करते श्रद्धालु
गंगा पूजा एवं दीपदान — पावन गंगा की धारा में अर्घ्य, पुष्प और दीप प्रज्वलित कर नमन करते श्रद्धालु

🪔 माँ गंगा की पूजा विधि एवं दीपदान परंपरा

गंगा तट पर अथवा घर में गंगाजल को तांबे के पात्र में रखकर विधिपूर्वक पूजन करने का शास्त्रीय विधान अत्यंत सरल एवं फलदायी है:

  1. स्नान एवं आचमन: प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में गंगा स्नान करें। यदि तट पर उपस्थित न हों, तो सामान्य जल में थोड़ा गंगाजल मिलाकर “गङ्गे च यमुने चैव…” मंत्र बोलते हुए स्नान करें। स्वच्छ श्वेत अथवा पीले वस्त्र धारण करें।
  2. सूर्य एवं गंगा अर्घ्य: तांबे के लोटे में शुद्ध गंगाजल, लाल चंदन, अक्षत और लाल पुष्प डालकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके भगवान सूर्य और माँ गंगा को तीन बार अर्घ्य समर्पित करें।
  3. षोडशोपचार अथवा पंचोपचार पूजन: माँ गंगा की प्रतिमा अथवा पावन जल का ध्यान करते हुए गंध (सफेद चंदन/रोली), अक्षत, श्वेत कमल अथवा गेंदे के पुष्प और सुगंधित धूप अर्पित करें।
  4. नैवेद्य अर्पण: माँ गंगा को दूध से बनी मिठाई, ऋतुफल अथवा पंचामृत का भोग लगाएं।
  5. दीपदान: दोने (पत्ते की नाव) में आटे अथवा मिट्टी का दीपक बनाकर उसमें गाय का घी या तिल का तेल डालकर प्रज्वलित करें। फूल रखकर श्रद्धापूर्वक माँ गंगा की धारा में दीप प्रवाहित करें। संध्याकालीन दीपदान से अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है।
  6. आरती एवं प्रदक्षिणा: कर्पूर का दीपक प्रज्वलित कर भक्तिभाव से “ॐ जय गंगे माता” आरती गाएं और यथास्थान तीन बार परिक्रमा करें।

🌺 गंगा पूजा सामग्री सूची

क्र. पूजन सामग्री धार्मिक एवं आध्यात्मिक प्रयोजन
1 शुद्ध गंगाजल पूजा स्थल की शुद्धि, आचमन और अर्घ्य हेतु साक्षात ब्रह्मद्रव
2 तांबे अथवा पीतल का कलश अर्घ्य समर्पण और जल संग्रहण का वैदिक शुभ पात्र
3 सफेद चंदन / रोली / अक्षत माँ गंगा के सात्विक स्वरूप को तिलक एवं अखंडता का समर्पण
4 श्वेत पुष्प, कमल एवं गेंदा देवी को अति प्रिय श्वेत और पीत वर्ण के सुगंधित पुष्प
5 मिट्टी/आटे के दीपक एवं शुद्ध घी पावन दीपदान और आरती प्रज्वलन हेतु
6 दूध, बताशे, पंचामृत एवं फल माँ गंगा को प्रिय सात्विक मधुर नैवेद्य भोग
7 धूप, अगरबत्ती एवं कर्पूर आरती एवं तट के वातावरण को सुगंधित व पवित्र करने हेतु
8 लाल चुनरी एवं सौभाग्य सामग्री अखंड सौभाग्य की कामना हेतु देवी गंगा को अर्पण

🌸 गंगा दशहरा और गंगा सप्तमी का पावन पर्व

सनातन पंचांग में माँ गंगा से संबंधित दो महापर्व अत्यंत श्रद्धा और उल्लास से मनाए जाते हैं:

  • १. गंगा सप्तमी (जाह्नवी जयंती): वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को गंगा सप्तमी कहा जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब गंगा पृथ्वी पर उतर रही थीं, तो उनके तीव्र वेग से महर्षि जह्नु का आश्रम जलमग्न हो गया। क्रोधित होकर महर्षि संपूर्ण गंगा का आचमन कर गए। देवताओं और भगीरथ की विनती पर महर्षि जह्नु ने वैशाख शुक्ल सप्तमी को अपने कान से गंगा को पुनः मुक्त किया। इस पुनर्जन्म के कारण गंगा का नाम ‘जाह्नवी’ पड़ा और यह दिन ‘गंगा जन्मोत्सव’ के रूप में पूजा जाता है।
  • २. गंगा दशहरा (अवतरण दिवस): ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को ‘गंगा दशहरा’ का महापर्व मनाया जाता है। इसी पावन तिथि को माँ गंगा भगवान शिव की जटाओं से मुक्त होकर पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं। इस दिन हस्त नक्षत्र, आनंद योग, व्यतिपात योग आदि 10 विशिष्ट ज्योतिषीय योगों का मिलन होता है। इस दिन गंगा स्नान और 10 प्रकार के दानों से मनुष्य के 10 प्रकार के पाप (3 कायिक, 4 वाचिक और 3 मानसिक) नष्ट हो जाते हैं।

🛕 प्रमुख गंगा तीर्थ — गंगोत्री से गंगासागर तक

लगभग 2,525 किलोमीटर की अपनी यात्रा में माँ गंगा भारतवर्ष की जीवनरेखा और आध्यात्मिक चेतना का केंद्र हैं। उनके प्रमुख तीर्थ स्थल इस प्रकार हैं:

  1. गंगोत्री धाम (उत्तराखंड): समुद्र तल से लगभग 3,100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित चारधामों में से एक प्रमुख धाम। यहां से 19 किमी आगे ‘गोमुख’ हिमनद से भागीरथी का उद्गम होता है।
  2. देवप्रयाग: पंच प्रयागों में सर्वोच्च, जहां भागीरथी और अलकनंदा का पावन संगम होता है और यहीं से इस संयुक्त धारा को विधिवत ‘गंगा’ का नाम मिलता है।
  3. हरिद्वार (मायापुरी): वह पावन नगरी जहां गंगा पर्वतों को छोड़कर मैदानी भाग में प्रवेश करती हैं। ‘हर की पौड़ी’ पर अमृत की बूंदें गिरी थीं, जहां विश्वप्रसिद्ध महाकुंभ और संध्या महाआरती होती है।
  4. प्रयागराज (तीर्थराज): गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का पावन ‘त्रिवेणी संगम’। यहां स्नान करने से अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।
  5. वाराणसी (काशी): भगवान विश्वनाथ की त्रिशूल पर बसी अविमुक्त नगरी। यहां गंगा उत्तरवाहिनी होकर बहती हैं, जो मोक्ष का साक्षात द्वार मानी जाती हैं।
  6. गंगासागर (पश्चिम बंगाल): जहां गंगा बंगाल की खाड़ी के समुद्र में विलीन होती हैं। यहीं महर्षि कपिल के आश्रम में सगर पुत्रों का उद्धार हुआ था। लोककहावत है—“सारे तीरथ बार-बार, गंगासागर एक बार”।

गंगा तट पर संध्या महाआरती एवं सहस्र दीपों का पावन दृश्य — काशी दशाश्वमेध घाट पर भव्य आरती
गंगा आरती की दिव्य परंपरा — सायंकाल घाटों पर गूंजते वेद मंत्र, प्रज्वलित बहुमंजिला पीतल के दीप और श्रद्धालुओं का भक्ति प्रवाह

🪔 गंगा आरती की पावन परंपरा

गंगा आरती सनातन धर्म की सबसे भव्य और नयनाभिराम दैनिक अनुष्ठानिक परंपरा है। वाराणसी के दशाश्वमेध घाट, हरिद्वार के हर की पौड़ी और ऋषिकेश के परमार्थ निकेतन में प्रत्येक संध्याकाल को यह महाआरती आयोजित की जाती है।

वैदिक बटुक और पुरोहित पारंपरिक रेशमी धोती-कुर्ता धारण कर विशेष पीतल के बहुमंजिला भारी दीपकों में कपूर व घी की ज्वाला प्रज्वलित करते हैं। शंख की गूंज, नगाड़े, घंटे और सहस्रों कंठों से एक साथ गाई जाने वाली “ॐ जय गंगे माता” आरती जल में तैरते दीपकों के साथ मिलकर एक अलौकिक आध्यात्मिक लोक की अनुभूति कराती है।

🌿 गंगा की स्वच्छता और सनातन धार्मिक परंपरा

सनातन धर्म के प्राचीन शास्त्रों में माँ गंगा की पवित्रता और स्वच्छता को अक्षुण्ण रखने के अत्यंत कठोर निर्देश दिए गए हैं। पद्म पुराण में स्पष्ट लिखा है कि जो व्यक्ति गंगा में मल-मूत्र त्यागता है, थूकता है, अपशिष्ट फेंकता है अथवा साबुन लगाकर स्नान करता है, वह पाप का भागी बनता है।

  • जीवंत सत्ता के रूप में सम्मान: माँ गंगा केवल एक प्राकृतिक जलस्रोत नहीं, अपितु भारतीय संस्कृति की प्राणधारिणी माता हैं। प्रत्येक श्रद्धालु का यह पुनीत धार्मिक कर्तव्य है कि वह गंगा में प्लास्टिक, रासायनिक कचरा अथवा अवांछित सामग्री न डाले।
  • पारिस्थितिक संतुलन: आधुनिक ‘नमामि गंगे’ अभियान भी इसी शास्त्रीय सत्य को पुष्ट करता है कि जब तक गंगा अविरल और निर्मल नहीं होगी, तब तक प्रकृति और मानवता का कल्याण असंभव है।

❓ Frequently Asked Questions (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

प्र. 1: माँ गंगा की आरती “ॐ जय गंगे माता” कब करनी चाहिए?

उत्तर: गंगा आरती नित्य प्रातः सूर्योदय के समय तथा सायंकाल गोधूलि बेला (संध्याकाल) में करना सर्वोत्तम माना गया है। विशेष रूप से गंगा दशहरा, गंगा सप्तमी, पूर्णिमा और कार्तिक पूर्णिमा पर इस आरती का विशेष महात्म्य है।

प्र. 2: गंगाजल कभी खराब क्यों नहीं होता?

उत्तर: धार्मिक दृष्टि से गंगा भगवान विष्णु के चरणों से निकली ब्रह्मद्रव हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से गंगाजल में विशेष प्रकार के ‘बैक्टीरियोफेज’ (Bacteriophage) वायरस पाए जाते हैं, जो हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट कर देते हैं, साथ ही इसमें प्रचुर मात्रा में सल्फर व मिनरल्स होते हैं, जिससे यह वर्षों तक शुद्ध बना रहता है।

प्र. 3: गंगा आरती में दीपदान का क्या महत्त्व है?

उत्तर: दीपदान अज्ञान के अंधकार को मिटाकर जीवन में ज्ञान और प्रकाश के आगमन का प्रतीक है। पुराणों के अनुसार, गंगा की बहती धारा में दीपदान करने से पितरों को शांति मिलती है और परिवार पर आने वाले अकाल कष्ट दूर होते हैं।

प्र. 4: गंगा को ‘त्रिपथगा’ क्यों कहा जाता है?

उत्तर: माँ गंगा तीनों लोकों—स्वर्गलोक, पृथ्वीलोक और पाताललोक—में प्रवाहित होती हैं। स्वर्ग में उन्हें ‘मंदाकिनी’, पृथ्वी पर ‘गंगा/भागीरथी’ और पाताल में ‘भोगवती’ कहा जाता है। तीन मार्गों से बहने के कारण ही उनका नाम ‘त्रिपथगा’ पड़ा।

प्र. 5: यदि गंगा तट पर न जा सकें तो घर पर गंगा पूजा कैसे करें?

उत्तर: घर में नित्य स्नान के जल में कुछ बूंदें गंगाजल की मिलाएं और “गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु॥” मंत्र बोलकर स्नान करें। पूजा स्थल पर तांबे के पात्र में गंगाजल रखकर धूप-दीप से “ॐ जय गंगे माता” आरती करें।

निष्कर्ष एवं पावन गंगा स्तुति

माँ गंगा भारत की केवल भौगोलिक नदी नहीं, अपितु हमारी सांस्कृतिक आत्मा, आस्था और मोक्ष की शाश्वत प्रतीक हैं। राजा भगीरथ की तपस्या और महादेव के त्याग का स्मरण कराती यह पावन धारा हमें निस्वार्थ परोपकार और पवित्रता का संदेश देती है। जब हम पूर्ण भक्तिभाव से माँ गंगा की आरती गाते हैं, तो हमारा अंतःकरण पवित्र हो जाता है।

॥ गाङ्गं वारि मनोहारि मुरारिचरणच्युतम्। त्रिपुरारिशिरश्चारि पापहारि पुनातु माम् ॥
॥ ॐ श्री गङ्गादेव्यै नमः ॥

भारतीयदूत संपादकीय मंडल

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