
सनातन धर्म में जगत के पालनहार भगवान श्री हरि विष्णु की आराधना में “ॐ जय जगदीश हरे” आरती का सर्वोच्च स्थान है। सच्चे भाव से इस पावन आरती का नित्य गायन करने से जीवन के समस्त संकट व क्लेश दूर होते हैं और घर-परिवार में सुख, शांति व अखंड समृद्धि का वास होता है।
🪔 ॐ जय जगदीश हरे — भगवान विष्णु की आरती
॥ श्री विष्णु जी की आरती ॥
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट,
क्षण में दूर करे॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
जो ध्यावे फल पावे, दुख बिनसे मन का, स्वामी दुख बिनसे मन का।
सुख सम्पति घर आवे, सुख सम्पति घर आवे,
कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी, स्वामी शरण गहूं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, तुम बिन और न दूजा,
आस करूं जिसकी॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी, स्वामी तुम अन्तर्यामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, पारब्रह्म परमेश्वर,
तुम सब के स्वामी॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
तुम करुणा के सागर, तुम पालन-कर्ता, स्वामी तुम पालन-कर्ता।
मैं मूरख खल कामी, मैं सेवक तुम स्वामी,
कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
तुम हो एक अगोचर, सब के प्राणपति, स्वामी सब के प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय, किस विधि मिलूं दयामय,
तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
दीन-बन्धु दुख-हर्ता, तुम ठाकुर मेरे, स्वामी तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, अपनी शरण लगाओ,
द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा, स्वामी पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ,
सन्तन की सेवा॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
तन, मन, धन सब है तेरा, स्वामी सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण, तेरा तुझको अर्पण,
क्या लागे मेरा॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट,
क्षण में दूर करे॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
📖 आरती का सरल भावार्थ
1. ॐ जय जगदीश हरे…: हे संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी, जगत के ईश्वर जगदीश! आपकी जय हो। आप अपने शरणागत भक्तों और दासों के समस्त संकटों, भयों और व्याधियों को क्षण मात्र में दूर करने वाले हैं।
2. जो ध्यावे फल पावे…: जो भी साधक सच्चे हृदय से आपका ध्यान करता है, वह अभीष्ट फल प्राप्त करता है और उसके मन के समस्त शोक व चिंताएं नष्ट हो जाती हैं। उसके घर में सुख-समृद्धि आती है और तन के समस्त व्याधि व कष्ट मिट जाते हैं।
3. मात-पिता तुम मेरे…: हे प्रभु! आप ही मेरे सच्चे माता-पिता और परम आश्रय हैं। आपके अतिरिक्त मैं किसकी शरण में जाऊं? संसार में आपके सिवा ऐसा कोई दूसरा नहीं, जिससे मैं अपने कल्याण की आशा रख सकूं।
4. तुम पूरण परमात्मा…: आप ही सर्वव्यापी पूर्ण परमात्मा और घट-घट की जानने वाले अन्तर्यामी हैं। आप ही सृष्टि के मूल पारब्रह्म परमेश्वर हैं और समस्त प्राणियों के एकमात्र स्वामी हैं।
5. तुम करुणा के सागर…: आप असीम दया और करुणा के महासागर हैं तथा समस्त चराचर का भरण-पोषण करने वाले हैं। मैं अज्ञानी और त्रुटियों से भरा हुआ सेवक हूँ, आप मेरे परम स्वामी हैं; अतः हे पालनहार! मुझ पर अपनी कृपा बनाए रखिए।
6. तुम हो एक अगोचर…: आप इंद्रियों की सीमा से परे (अगोचर) हैं और समस्त जीवों के प्राणेश्वर हैं। मैं मंदबुद्धि जीव किस साधना व विधि से आपके अलौकिक दर्शन पा सकता हूँ? यह आपकी अहैतुकी कृपा से ही संभव है।
7. दीन-बन्धु दुख-हर्ता…: हे दीनों के बंधु, दुखहर्ता! आप ही मेरे रक्षक और स्वामी हैं। अपने वरदहस्त उठाइए और मुझे अपने चरणों की शरण में स्थान दीजिए; मैं आपके द्वार पर पड़ा हुआ याचक हूँ।
8. विषय-विकार मिटाओ…: हे देवाधिदेव! मेरे भीतर से काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि विकारों को मिटाइए और मेरे पूर्वजन्मों के पापों का शमन कीजिए। मेरे हृदय में संतों की सेवा और आपके चरणों के प्रति अगाध श्रद्धा-भक्ति का संचार कीजिए।
9. तन, मन, धन सब है तेरा…: मेरा यह नश्वर शरीर, मन और सांसारिक धन-संपत्ति सब कुछ आपका ही दिया हुआ है। वास्तव में मेरा अपना कुछ भी नहीं है; जो कुछ आपका है, वही आपको समर्पित है।
🙏 आरती का धार्मिक महत्त्व
“ॐ जय जगदीश हरे” आरती की रचना 19वीं शताब्दी में पंजाब के सुप्रसिद्ध विद्वान पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी द्वारा मानी जाती है। यह आरती केवल भगवान विष्णु की ही नहीं, अपितु सनातन धर्म में प्रत्येक सत्यनारायण व्रत कथा, गृह प्रवेश, विवाह, उत्सव और दैनिक संध्या-आरती में सार्वभौमिक रूप से गाई जाती है।
- समर्पण योग का सर्वोच्च उदाहरण: इस आरती का मूल भाव ‘तेरा तुझको अर्पण’ है, जो साधक के मन से अहंकार को समाप्त कर पूर्ण शरणागति की भावना जाग्रत करता है।
- सकारात्मक ऊर्जा का संचार: सामूहिक स्वर में जब शंख, घंटी और कर्पूर के साथ यह आरती गाई जाती है, तो वातावरण में सकारात्मकता और सात्विक ऊर्जा का संचार होता है।
- त्रिविध तापों का शमन: पद्म पुराण और विष्णु पुराण के अनुसार, भगवान जगदीश की आरती का श्रवण व कीर्तन करने से मनुष्य के दैहिक, दैविक और भौतिक कष्ट शांत होते हैं।

🛕 भगवान विष्णु का परिचय
सनातन धर्म के त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) में भगवान विष्णु को पालनहार (स्थिति के अधिष्ठाता) का स्थान प्राप्त है। ‘विष्णु’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत की ‘विश्’ धातु से हुई है, जिसका अर्थ है—’सर्वव्यापी’ अथवा ‘जो समस्त सृष्टि में व्याप्त है’।
- चतुर्भुज स्वरूप: भगवान विष्णु चार भुजाओं से युक्त हैं, जो चारों दिशाओं और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष रूपी चार पुरुषार्थों के नियामक हैं।
- शंख (पांचजन्य): दिव्य ओंकार ध्वनि और ज्ञान का प्रतीक है, जो अज्ञान और अधर्म को नष्ट करता है।
- चक्र (सुदर्शन): कालचक्र और धर्म की रक्षा का अमोघ अस्त्र है।
- गदा (कौमोदकी): शारीरिक व आत्मिक बल तथा अधर्मियों के दमन का सूचक है।
- पद्म (कमल): जल और कीचड़ में रहकर भी निर्लिप्त रहने वाली अनासक्ति, सौंदर्य और पवित्रता का प्रतीक है।
- वाहन व शयन: पक्षीराज गरुड़ उनके दिव्य वाहन हैं और वे अनंत नाग (शेषनाग) की शैय्या पर क्षीरसागर में योगनिद्रा में स्थित रहते हैं।
📜 भगवान विष्णु के प्रमुख अवतार (दशावतार)
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है—“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत… धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे”। जब-जब धर्म की हानि होती है, तब-तब भगवान विष्णु अवतार धारण करते हैं। उनके दस प्रमुख अवतार (दशावतार) इस प्रकार हैं:
- मत्स्यावतार: प्रलयकाल में वेदों और मनु की रक्षा हेतु जलचर रूप।
- कूर्मावतार: समुद्र मंथन के समय मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर धारण करने वाला कच्छप रूप।
- वराहावतार: हिरण्याक्ष का वध कर पाताल से पृथ्वी को बाहर निकालने वाला अवतार।
- नृसिंहावतार: भक्त प्रह्लाद की रक्षा और हिरण्यकशिपु के वध हेतु आधा सिंह व आधा नर रूप।
- वामनावतार: राजा बलि के अहंकार का मर्दन कर तीनों लोकों को मुक्त कराने वाला ब्रह्मचारी रूप।
- परशुरामावतार: अधर्मी और अत्याचारी क्षत्रियों के दमन हेतु शस्त्रधारी ऋषि रूप।
- श्रीरामावतार: मर्यादा, धर्म और सत्य के आदर्श स्थापक, रावण संहारक मर्यादा पुरुषोत्तम रूप।
- श्रीकृष्णावतार: गीता के उपदेशक, कंस संहारक और प्रेम व कर्मयोग के साक्षात विग्रह।
- बुद्धावतार: अहिंसा, करुणा और आत्म-साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त करने वाला रूप।
- कल्कि अवतार: कलियुग के अंत में अधर्म का नाश कर सतयुग की पुनः स्थापना हेतु भविष्यगामी अवतार।

🪔 भगवान विष्णु की पूजा विधि
भगवान विष्णु की पूजा सात्विक भाव और शुद्ध आचरण से की जाती है। विशेष रूप से गुरुवार (बृहस्पतिवार) और एकादशी के दिन यह विधि अत्यंत फलदायी मानी जाती है:
- शुद्धि व संकल्प: प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करें और पीले वस्त्र धारण करें। हाथ में जल व अक्षत लेकर भगवान श्री हरि विष्णु की पूजा का मानसिक संकल्प लें।
- चौकी की स्थापना: लकड़ी की एक स्वच्छ चौकी पर पीला रेशमी वस्त्र बिछाएं और भगवान विष्णु अथवा शालिग्राम जी की प्रतिमा स्थापित करें।
- पंचामृत स्नान: प्रतिमा को गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद और शर्करा (पंचामृत) से स्नान कराएं। तत्पश्चात शुद्ध जल से आचमन कराकर स्वच्छ वस्त्र अर्पित करें।
- तिलक व पुष्प समर्पण: भगवान को गोपीचंदन अथवा पीला चंदन लगाएं। पीले गेंदे या कनेर के पुष्प और तुलसी दल अर्पित करें। (ध्यान रहे: बिना तुलसी दल के भगवान विष्णु भोग स्वीकार नहीं करते)।
- नैवेद्य अर्पण: बेसन के लड्डू, चने की दाल-गुड़, पीले फल (केला) अथवा खीर का भोग लगाएं।
- आरती व प्रदक्षिणा: कर्पूर अथवा घी का पंचमुखी दीपक प्रज्वलित कर श्रद्धापूर्वक “ॐ जय जगदीश हरे” आरती गाएं और अंत में तीन बार परिक्रमा करें।
🌺 पूजा सामग्री
| क्र. | पूजन सामग्री | पारंपरिक एवं आध्यात्मिक महत्त्व |
|---|---|---|
| 1 | तुलसी पत्र व मंजरी | विष्णु प्रिया, जिसके बिना कोई भी नैवेद्य या पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती |
| 2 | पीला चंदन / गोपीचंदन | शीतलता, सात्विकता और भगवान विष्णु का प्रिय वर्ण |
| 3 | पीले पुष्प व माला (गेंदा/कमल) | पीतांबरधारी श्री हरि को अत्यंत प्रिय पुष्प |
| 4 | पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल) | अभिषेक हेतु परम पावन व अमृततुल्य द्रव्य |
| 5 | केला व ऋतुफल | विशेष नैवेद्य, गुरुवार पूजा में केले का फल व वृक्ष पूजन अनिवार्य |
| 6 | शुद्ध गाय का घी व कर्पूर | आरती एवं वातावरण को पूर्णतः सात्विक बनाने हेतु |
| 7 | शंख व घंटी | नकारात्मक ऊर्जा का नाश और दिव्य नाद का विस्तार |
⏰ विष्णु आरती कब करें?
- दैनिक पूजा: प्रातःकालीन पूजा के समापन पर तथा सायंकाल संध्या-आरती के समय इसका गान नित्य किया जा सकता है।
- सत्यनारायण कथा: किसी भी मास की पूर्णिमा अथवा पारिवारिक मंगल कार्यों पर होने वाली श्री सत्यनारायण व्रत कथा के समापन पर यह आरती अनिवार्य मानी जाती है।
- एकादशी व्रत: प्रत्येक मास के दोनों पक्षों की एकादशी तिथि को भगवान विष्णु की इस आरती का पाठ अक्षय पुण्य प्रदान करता है।
- गुरुवार (बृहस्पतिवार): बृहस्पति ग्रह की शांति और श्री हरि कृपा हेतु गुरुवार को आरती करना विशेष फलदायी है।

📿 विष्णु मंत्र और नाम-स्मरण
आरती से पूर्व अथवा पश्चात इन सिद्ध विष्णु मंत्रों का जप करना मन को एकाग्र और चित्त को शांत करता है:
१. द्वादशाक्षर महामंत्र:
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
२. अष्टाक्षर महामंत्र:
ॐ नमो नारायणाय॥
३. विष्णु मंगल श्लोक:
मङ्गलं भगवान् विष्णुः मङ्गलं गरुडध्वजः।
मङ्गलं पुण्डरीकाक्षः मङ्गलाय तनो हरिः॥

❓ Frequently Asked Questions (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
प्र. 1: “ॐ जय जगदीश हरे” आरती के रचयिता कौन हैं?
उत्तर: इस प्रसिद्ध आरती की रचना 1870 ईस्वी के आसपास पंजाब के फिल्लौर निवासी पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी द्वारा की गई थी। बाद में यह आरती संपूर्ण भारतवर्ष और विश्व भर में सनातन धर्मावलंबियों के बीच सर्वाधिक लोकप्रिय बन गई।
प्र. 2: क्या विष्णु जी की पूजा में तुलसी अनिवार्य है?
उत्तर: हाँ, भगवान विष्णु की पूजा और भोग में तुलसी पत्र का होना अनिवार्य माना गया है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, तुलसी के बिना भगवान विष्णु कोई भी नैवेद्य स्वीकार नहीं करते हैं।
प्र. 3: विष्णु आरती के समय किन वाद्ययंत्रों का प्रयोग करना चाहिए?
उत्तर: आरती करते समय शंख की ध्वनि, पीतल की घंटी और करताल (झांझ) का प्रयोग अति शुभ माना जाता है। शंख और घंटी का नाद आस-पास की नकारात्मकता को दूर कर मन को शुद्ध करता है।
प्र. 4: क्या इस आरती को किसी भी दिन गाया जा सकता है?
उत्तर: बिल्कुल। यद्यपि गुरुवार, एकादशी और पूर्णिमा के दिन इसका विशेष महात्म्य है, परंतु दैनिक प्रातः और सायं पूजा में यह आरती प्रतिदिन गाई जा सकती है।
निष्कर्ष एवं मंगल प्रार्थना
भगवान विष्णु की आरती “ॐ जय जगदीश हरे” संपूर्ण शरणागति, आत्म-समर्पण और भक्ति का सर्वोच्च प्रतीक है। जब हम ‘तेरा तुझको अर्पण’ का भाव हृदय में धारण कर भगवान की आरती करते हैं, तो हमारे भीतर से अहंकार और स्वार्थ का नाश होता है। भगवान श्री हरि विष्णु समस्त भक्तों के जीवन में आरोग्य, सुख, शांति और मोक्ष का प्रकाश फैलाएं।
॥ शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ॥
॥ ॐ श्री विष्णवे नमः ॥