BHARATIYADOOT धर्म | संस्कृति | हमारी पहचान

भगवान भैरव जी की आरती — आरती, अर्थ, पूजा विधि और महत्त्व

भगवान भैरव (काल भैरव व बटुक भैरव) की पावन आरती "जय भैरव देवा" का संपूर्ण पाठ, सरल भावार्थ, शिव-भैरव संबंध, कालाष्टमी का महत्त्व, पूजा विधि और भोग परंपरा।

00:00
--:--

काल भैरव मंदिर में भगवान भैरव का दिव्य स्वरूप
काल भैरव मंदिर में भगवान भैरव का दिव्य स्वरूप — श्वान वाहन, त्रिशूल व डमरू धारण किए काशी के कोतवाल भगवान काल भैरव का भव्य विग्रह

सनातन धर्म में देवाधिदेव महादेव के अत्यंत तेजस्वी व करुणामयी अवतार भगवान भैरव (काल भैरव) की आरती का नित्य श्रवण व गान करने से साधक के जीवन से समस्त भय, नकारात्मक ऊर्जा, ग्रह-दोष और संकटों का तत्क्षण निवारण हो जाता है। काशी के कोतवाल और धर्म के रक्षक प्रभु भैरव अपने अनन्य भक्तों पर सदैव अभय और सुख-समृद्धि की कृपा बरसाते हैं।

🪔 भगवान भैरव जी की आरती

॥ श्री भैरव जी की पावन आरती ॥

जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा।
जय काली और गौरा, देवी कृत सेवा॥
॥ जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा…॥

तुम्हीं पाप उद्धारक, दुःख सिन्धु तारक।
भक्तों के सुख कारक, भीषण वपु धारक॥
॥ जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा…॥

वाहन श्वान विराजत, कर त्रिशूल धारी।
महिमा अमित तुम्हारी, जय जय भयहारी॥
॥ जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा…॥

तुम बिन देवा सेवा, सफल नहीं होवे।
चौमुख दीपक दर्शन, दुःख सगरे खोवे॥
॥ जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा…॥

तेल चटकि दधि मिश्रित, भाषावलि तेरी।
कृपा कीजिये भैरव, करिये नहीं देरी॥
॥ जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा…॥

पाँव घुंघरू बाजत, डमरू डमकावत।
बटुकनाथ बन बालक, जन मन हरषावत॥
॥ जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा…॥

श्याम वरण तन राजे, शूल त्रिशूल हाथ।
डमरू नाद बजावत, भैरव अघनाथा॥
॥ जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा…॥

गले मुंडमाला सोहे, भाल तिलक साजे।
कुंडल कानन झलके, सब भय दल भाजे॥
॥ जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा…॥

काशी के कोतवाल, शरण जो कोई आवे।
जन्म-जन्म के पातक, पल में मिट जावे॥
॥ जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा…॥

बटुकनाथ जी की आरती, जो कोई नर गावे।
कहे धरणीधर वह नर, मनवांछित फल पावे॥
॥ जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा…॥

📖 आरती का सरल भावार्थ

श्री भैरव जी की आरती का प्रत्येक पद गहन आध्यात्मिक रहस्य, शरणागति और आत्मिक शक्ति का द्योतक है:

  • जय भैरव देवा, जय काली और गौरा देवी कृत सेवा: हे प्रभु भैरव देव, आपकी सदा ही जय हो। भगवती महाकाली और माता पार्वती (गौरा) भी आपका आदर करती हैं तथा आपकी शक्ति की स्तुति करती हैं।
  • तुम्हीं पाप उद्धारक, दुःख सिन्धु तारक: आप अपने शरणागत भक्तों के समस्त पापों का संहार करने वाले और इस संसार रूपी अथाह दुःख सागर से पार उतारने वाले तारणहार हैं। आपका स्वरूप अधर्मियों के लिए अत्यंत भीषण और भक्तों के लिए परम कृपालु है।
  • वाहन श्वान विराजत, कर त्रिशूल धारी: आपके पावन वाहन के रूप में स्वामिभक्त श्वान (काला कुत्ता) शोभित है और आपके कर-कमलों में दुष्टों के दलन हेतु दिव्य त्रिशूल सुशोभित है। आपकी असीम महिमा समस्त भयों का नाश करती है।
  • तुम बिन देवा सेवा, सफल नहीं होवे: काशी क्षेत्र अथवा शक्तिपीठों में भैरव जी की वंदना किए बिना कोई भी साधना या देव-सेवा पूर्ण नहीं मानी जाती। आपके सम्मुख चौमुखा दीपक प्रज्वलित करने मात्र से जीवन के समस्त क्लेश मिट जाते हैं।
  • पाँव घुंघरू बाजत, डमरू डमकावत: जब आप नटराज स्वरूप में नृत्य करते हैं तो चरणों में नूपुर रुनझुन बजते हैं और हाथों में डमरू का गंभीर नाद गूंजता है। बटुक स्वरूप में बालक बनकर आप भक्तों के हृदय को आनंदित करते हैं।
  • काशी के कोतवाल, शरण जो कोई आवे: काशी के मुख्य संरक्षक (कोतवाल) के रूप में जो भी प्राणी आपकी शरण में आता है, उसके जन्म-जन्मांतर के संचित पाप और प्रारब्ध के ताप तत्काल भस्म हो जाते हैं।

🙏 भैरव आरती का धार्मिक महत्त्व

काल भैरव मंदिर में आरती
काल भैरव मंदिर में आरती — बहुस्तरीय पीतल के महादीप, शंखध्वनि और घंटा-निनाद के बीच भगवान भैरव की मंगल आरती करते पुजारी व श्रद्धालु

सनातन धर्मग्रंथों में भगवान भैरव की आरती को “सर्वबाधा-प्रशमनम्” (समस्त बाधाओं को शांत करने वाली) माना गया है। तंत्र शास्त्र और पुराणों में भैरव उपासना को कलियुग में तुरंत फल देने वाली जागृत साधना कहा गया है:

  • भय और व्याधियों से मुक्ति: जिन्हें अज्ञात भय, मानसिक अशांति, डरावने स्वप्न या अवसाद सताता हो, उनके लिए नित्य सांध्यकाल में भैरव आरती का श्रवण संजीवनी के समान है।
  • ग्रह-दोष एवं शनि-राहु की शांति: ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, कुंडली में शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या, राहु-केतु के अनिष्टकारी प्रभाव अथवा कालसर्प दोष की शांति के लिए भैरव जी की पूजा व आरती अचूक मानी जाती है।
  • नकारात्मक ऊर्जा से अभेद्य सुरक्षा: घर के वातावरण में सकारात्मकता और सुरक्षा कवच स्थापित करने के लिए तेल का चौमुखा दीपक जलाकर आरती करने का शास्त्रीय विधान है।
  • आत्मविश्वास और धर्मपरायणता की वृद्धि: भैरव जी काल के अधिपति हैं, अतः वे साधक को समय की गति के अनुरूप दृढ़, निर्भीक और सत्य के मार्ग पर चलने की शक्ति प्रदान करते हैं।


भगवान काल भैरव का दिव्य स्वरूप
भगवान काल भैरव का दिव्य स्वरूप — सौम्य एवं तेजस्वी मुखमंडल, रुद्राक्ष माला, सुवर्ण आभरण और आज्ञाकारी श्वान के साथ दिव्य दर्शन

🔱 भगवान भैरव का परिचय

संस्कृत व्याकरण और शैवागम के अनुसार ‘भैरव’ शब्द तीन पावन बीजाक्षरों के समन्वय से निर्मित है:

  • ‘भ’ (भरण): सृष्टि का पोषण और भरण करने वाली पराशक्ति।
  • ‘र’ (रमण): संसार में चेतना, प्रकाश और आनंद का संचार करने वाला तत्त्व।
  • ‘व’ (वमन): काल आने पर संपूर्ण जगत को स्वयं में विलीन (लय) करने वाला परम शिव तत्त्व।

अतः भगवान भैरव कोई साधारण लोक-देवता नहीं, अपितु संपूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति, स्थिति और लय के स्वामी परब्रह्म सदाशिव के पूर्ण अवतार हैं। शास्त्रों में भगवान भैरव के प्रमुखतः दो रूपों की सर्वाधिक उपासना की जाती है:

  1. श्री बटुक भैरव: यह भगवान भैरव का बाल रूप (सौम्य स्वरूप) है। गृहस्थ साधकों के लिए बटुक भैरव की उपासना अत्यंत सुगम, सौम्य और मनोकामना पूर्ति कराने वाली मानी जाती है।
  2. श्री काल भैरव: यह समय और न्याय के महाप्रचंड अधिपति हैं। काशी में स्थित काल भैरव मंदिर समस्त तांत्रिक और वैदिक पीठों का हृदय माना जाता है, जहाँ वे काशी के दंडाधिकारी (कोतवाल) के रूप में प्रतिष्ठित हैं।


भगवान शिव और काल भैरव का पौराणिक दृश्य
भगवान शिव और काल भैरव का पौराणिक दृश्य — हिमाच्छादित कैलाश शिखर पर ध्यानमग्न भगवान शिव के समीप सादर उपस्थित भगवान काल भैरव

📜 भगवान शिव और भैरव का संबंध

शिव महापुराण (शतद्रुद्रसंहिता) के अनुसार, एक बार परमपिता ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु के मध्य सृष्टि के आदि-अंत को लेकर विचार-विमर्श हुआ। उसी समय वेदों ने भगवान शिव को परात्पर ब्रह्म घोषित किया, किंतु अहंकारवश ब्रह्मा जी के पांचवें मुख ने भगवान शिव के प्रति अनुचित वचन कह दिए।

उस अहंकार का शमन करने के लिए भगवान शिव की भौंहों के मध्य (तीसरे नेत्र के तेज) से एक अत्यंत तेजस्वी, दीप्तिमान पुरुष प्रकट हुआ, जिसे भगवान शिव ने ‘भैरव’ नाम दिया और उन्हें काल का नियंता होने के कारण ‘कालराज’ कहा। भगवान भैरव ने अपने नखाग्र से ब्रह्मा जी के उस पांचवें घमंडी मस्तक का छेदन कर दिया।

इसके पश्चात ब्रह्महत्या के दोष की लोक-मर्यादा निभाने हेतु भैरव जी ने त्रिलोक का भ्रमण किया। जब वे पावन नगरी काशी (अविमुक्त क्षेत्र) में प्रविष्ट हुए, तो कपाल उनके हाथ से स्वतः छूटकर गिर गया और वे दोषमुक्त हो गए। तब देवाधिदेव महादेव ने प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया: “हे काल भैरव! तुम मेरी इस परम प्रिय काशी नगरी के शाश्वत क्षेत्रपाल (कोतवाल) रहोगे। जो भी व्यक्ति काशी में निवास करेगा या विश्वनाथ जी के दर्शन करेगा, उसे सर्वप्रथम तुम्हारी आज्ञा और कृपा प्राप्त करनी होगी।”

🕉️ काल भैरव का धार्मिक स्वरूप और प्रतीकात्मक अर्थ

धार्मिक व शास्त्रीय दृष्टि से भगवान भैरव का स्वरूप भयभीत करने वाला नहीं, अपितु ब्रह्मांडीय सत्यों का साक्षात दिग्दर्शन कराने वाला अत्यंत गरिमापूर्ण और वंदनीय है:

  • नील-श्याम वर्ण: भगवान भैरव का गहरा नीला-काला वर्ण अनंत आकाश, अंधकार के परे छिपे ज्ञान तथा समय (काल) की उस शक्ति का प्रतीक है जो सर्वव्यापी और अविनाशी है।
  • त्रिशूल: त्रिशूल आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक—तीनों प्रकार के तापों और अज्ञान का संहार कर धर्म की रक्षा का सूचक है।
  • डमरू: यह सृष्टि के प्रथम नाद (नादब्रह्म) और समय के अनवरत चक्र का प्रतीक है।
  • वाहन श्वान (काला कुत्ता): भारतीय संस्कृति में श्वान सतर्कता, निष्ठा, संवेदनशीलता और सत्य का रक्षक माना गया है। यमराज और धर्मराज की कथाओं में भी श्वान को निष्पक्ष दृष्टि का प्रतीक कहा गया है। भैरव जी का श्वान पर आरूढ़ होना यह संदेश देता है कि निष्ठावान और निष्कलंक सेवक प्रभु के सबसे निकट होता है।
  • दंडपाणि स्वरूप: हाथ में दंड धारण करना न्याय, अनुशासन और कर्म-फल के यथोचित वितरण का द्योतक है।


कालाष्टमी पर काल भैरव की पूजा
कालाष्टमी पर काल भैरव की पूजा — प्राचीन मंदिर में पुष्पों व दीपों से सुसज्जित भैरव विग्रह के सम्मुख हाथ जोड़े नमन करते श्रद्धालु

🌙 कालाष्टमी का महत्त्व

हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को ‘कालाष्टमी’ (भैरवाष्टमी) के रूप में अत्यंत श्रद्धा से मनाया जाता है। वर्ष भर में पड़ने वाली 12 कालाष्टमियों में से मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी का स्थान सर्वोपरि है, क्योंकि इसी पावन तिथि पर भगवान काल भैरव का प्राकट्य हुआ था, जिसे काल भैरव जयंती कहा जाता है।

कालाष्टमी के दिन व्रत रखने और सांध्यकाल में भैरव जी की आरती करने से व्यक्ति को कई विशेष लाभ प्राप्त होते हैं:

  • कालसर्प दोष और पितृ दोष के दुष्प्रभावों में अभूतपूर्व कमी आती है।
  • शत्रु बाधा और अकारण लगने वाले झूठे मुकदमों या विवादों से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
  • इस दिन काले कुत्ते को मीठी रोटी, गुड़ या दूध पिलाने से यमराज और भैरव जी दोनों की विशेष अनुकंपा प्राप्त होती है।
  • संध्या समय किसी प्राचीन शिव अथवा भैरव मंदिर में 8 या 11 तेल के दीपक जलाने से अखंड सौभाग्य और आरोग्य की प्राप्ति होती है।


काल भैरव की पारंपरिक पूजा विधि
काल भैरव की पारंपरिक पूजा विधि — मंदिर प्रांगण में दीप, कलश, पुष्प और नैवेद्य के साथ भगवान भैरव की सात्विक उपासना में लीन साधक

🪔 भैरव पूजा की सरल व सात्विक विधि

गृहस्थ साधकों के लिए भगवान भैरव की सात्विक पूजा विधि अत्यंत फलदायी और सरल है। इसे रविवार, मंगलवार या कालाष्टमी के दिन अवश्य करना चाहिए:

  1. शुद्धिकरण एवं संकल्प: प्रात:काल अथवा सायंकाल स्नान कर स्वच्छ लाल या पीले वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें और पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख कर आसन बिछाएं।
  2. गणेश व शिव पूजन: सर्वप्रथम विघ्नहर्ता भगवान श्रीगणेश और देवाधिदेव महादेव का ध्यान कर उन्हें प्रणाम करें।
  3. दीपक प्रज्वलन: एक मिट्टी अथवा पीतल के दीपक में सरसों का तेल या तिल का तेल भरकर चार मुखी बत्ती (चौमुखा दीपक) प्रज्वलित करें।
  4. तिलक व अर्पण: भगवान भैरव के चित्र अथवा शिवलिंग पर सिंदूर, कुमकुम, अक्षत और भस्म अर्पित करें। लाल कनेर, गुड़हल या नीले अपराजिता के पुष्प अर्पित करें।
  5. धूप व नैवेद्य: गूगल अथवा लोबान की सुगंधित धूप दिखाएं। भोग के रूप में उड़द की दाल के पकोड़े (बड़े), इमरती, गुड़, तिल के लड्डू अथवा नारियल अर्पित करें।
  6. मंत्र जप: रुद्राक्ष की माला से “ॐ कालभैरवाय नमः” अथवा “ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ” का कम से कम 108 बार श्रद्धापूर्वक जप करें।
  7. आरती: कपूर और दीप से सपरिवार खड़े होकर “जय भैरव देवा” आरती का भक्तिमय गायन करें। अंत में श्वान को भोजन कराएं।

🌺 भैरव पूजा सामग्री सारणी

भैरव पूजन से पूर्व निम्नलिखित प्रामाणिक व पारंपरिक पूजन सामग्री एकत्रित कर लें:

पूजन सामग्री धार्मिक महत्त्व एवं उपयोग
चौमुखा दीपक व सरसों का तेल चारों दिशाओं से सुरक्षा और अनिष्टकारी शक्तियों के शमन हेतु।
सिंदूर और चमेली का तेल भगवान भैरव के श्रृंगार व चोला अर्पण के लिए अत्यंत प्रिय।
काले तिल और साबुत उड़द शनि व राहु दोष शांति तथा संकटमुक्ति के लिए समर्पित किए जाते हैं।
इमरती, जलेबी व उड़द के बड़े भगवान भैरव का पारंपरिक सात्विक महाभोग।
लाल/पीले पुष्प व माला गुड़हल, गेंदा या कनेर के पुष्प भैरव जी को विशेष भाते हैं।
गूगल, लोबान व कपूर वातावरण की शुद्धि और मंगल आरती के लिए अनिवार्य।
काला धागा / रक्षा सूत्र भैरव जी के चरणों से स्पर्श कराकर बच्चों व साधकों की सुरक्षा हेतु बांधा जाता है।

⏰ भैरव आरती कब करें?

यद्यपि भक्त किसी भी समय प्रभु का स्मरण कर सकते हैं, किंतु शास्त्रों में भैरव आरती के लिए निम्नलिखित समय सर्वश्रेष्ठ माने गए हैं:

  • संध्या काल (गोधूलि वेला): सूर्यास्त के ठीक बाद का समय भैरव आरती के लिए अत्यंत प्रशस्त माना जाता है।
  • प्रदोष काल व निशीथ काल: रात्रि के प्रथम प्रहर (8:00 से 10:00 बजे के बीच) की गई आरती गृहक्लेश और आंतरिक चिंताओं को समूल नष्ट कर देती है।
  • विशेष दिन: मंगलवार और रविवार भगवान भैरव की आराधना के मुख्य वार हैं। इसके अतिरिक्त प्रत्येक मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी (कालाष्टमी) पर आरती का फल कई गुना बढ़ जाता है।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: क्या गृहस्थ परिवार में भगवान भैरव की पूजा व आरती की जा सकती है?

उत्तर: हाँ, बिल्कुल। गृहस्थ साधक भगवान भैरव के सौम्य रूप (बटुक भैरव) और काल भैरव की सात्विक पूजा, दीपदान व आरती अपने घर में पूर्ण श्रद्धा के साथ कर सकते हैं। सात्विक पूजा से घर में अभय, शांति और सुरक्षा का वातावरण निर्मित होता है।

प्रश्न 2: भैरव जी को कौन सा दीपक सबसे प्रिय है?

उत्तर: भगवान भैरव को सरसों के तेल अथवा काले तिल के तेल का चौमुखा (चार बत्तियों वाला) दीपक सबसे अधिक प्रिय है। चौमुखा दीपक चारों दिशाओं से सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है।

प्रश्न 3: भैरव जी की पूजा में कुत्ते (श्वान) को भोजन कराने का क्या महत्त्व है?

उत्तर: श्वान भगवान भैरव का पावन वाहन और सेवक है। कालाष्टमी या रविवार को काले श्वान को मीठी रोटी, गुड़ या दूध-रोटी खिलाने से भगवान भैरव अत्यंत शीघ्र प्रसन्न होते हैं और साधक के संकटों को हर लेते हैं।

प्रश्न 4: काशी यात्रा में काल भैरव दर्शन क्यों आवश्यक माना गया है?

उत्तर: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार काल भैरव काशी के ‘कोतवाल’ (मुख्य रक्षक) हैं। भगवान विश्वनाथ के दर्शन के पश्चात जब तक काल भैरव जी के दर्शन कर उनकी आज्ञा प्राप्त न की जाए, तब तक काशी यात्रा का संपूर्ण पुण्य फल प्राप्त नहीं होता।

🌿 निष्कर्ष व पावन भैरव ध्यान

भगवान भैरव न्याय, सत्य, काल और अभय के साक्षात विग्रह हैं। वे उन सभी अहंकारियों के लिए काल हैं जो धर्म का उल्लंघन करते हैं, किंतु निष्कपट हृदय से पुकारने वाले अपने भक्तों के लिए वे एक परम दयालु पिता के समान रक्षा कवच बन जाते हैं।

आइए, आदि शंकराचार्य विरचित श्री कालभैरवाष्टकम् के इस पावन मंगलाचरण के साथ प्रभु के चरणों में अपना सर्वस्व समर्पित करें:

देवराजसेव्यमानपावनाङ्घ्रिपङ्कजं व्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम्।
नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगम्बरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥

(भावार्थ: जिनके पवित्र चरणकमल देवराज इंद्र द्वारा पूजित हैं, जो सर्पों का यज्ञोपवीत और मस्तक पर चंद्रमा धारण करते हैं, उन काशी के अधिपति भगवान काल भैरव का मैं सादर ध्यान व वंदन करता हूँ।)

भारतीयदूत संपादकीय मंडल

भारतीयदूत संपादकीय मंडल

✓ प्रमाणित शोध पीठ
🚩 धर्मो रक्षति रक्षितः

सनातन धर्म, वेद एवं संस्कृति शोध पीठ

भारतीयदूत की धर्म एवं संस्कृति शोध पीठ प्रामाणिक पौराणिक ग्रंथों, वेदों, उपनिषदों और सनातन परंपराओं पर गहन अध्ययन कर प्रामाणिक व शोधपरक सामग्री पाठकों तक पहुँचाने के लिए समर्पित है।

संबंधित पावन रचनाएं

🙏 अपने पावन विचार एवं अनुभव साझा करें

सनातन धर्म, संस्कृति एवं इस पावन रचना से जुड़े अपने भाव यहाँ व्यक्त करें। आपका ईमेल पता पूर्णतः सुरक्षित रहेगा। आवश्यक प्रविष्टियाँ * से चिह्नांकित हैं।