भक्त प्रह्लाद और भगवान नरसिंह की कथा — खंभे से प्राकट्य एवं हिरण्यकश्यप वध
ईश्वर के सर्वव्यापक होने का अमर प्रमाण — जहां भक्त की आस्था ने रचा साक्षात चमत्कार
भक्त प्रह्लाद और भगवान नरसिंह की कथा — खंभे से प्राकट्य एवं हिरण्यकश्यप वध (Audio)
भक्त प्रह्लाद और भगवान नरसिंह की कथा — खंभे से प्राकट्य एवं हिरण्यकश्यप वध पाठ
उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्।
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्॥
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्॥
नरसिंह महामंत्र: जो उग्र, परम पराक्रमी, महाविष्णु स्वरूप, प्रदीप्त ज्वालाओं से युक्त, भयंकर किंतु भक्तों के लिए परम कल्याणकारी और मृत्यु की भी मृत्यु हैं, उन भगवान नृसिंह को हमारा बारंबार नमन।
भक्त प्रह्लाद और भगवान नरसिंह की कथा — खंभे से प्राकट्य एवं हिरण्यकश्यप वध का महत्व एवं आध्यात्मिक लाभ
⚔️ हिरण्यकश्यप का अहंकार और प्रह्लाद की भक्ति
दैत्यराज हिरण्यकश्यप ने ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त किया था कि वह न मनुष्य से मरे न पशु से, न दिन में न रात में, न घर के अंदर न बाहर, न अस्त्र से न शस्त्र से, न भूमि पर न आकाश में। इस वरदान के मद में चूर होकर उसने स्वयं को ईश्वर घोषित कर दिया। परंतु उसके अपने घर में माता कयाधू के गर्भ में नारद जी के उपदेश श्रवण करने वाले भक्त प्रह्लाद ने जन्म लिया, जिनका रोम-रोम नारायणमय था।
🦁 स्फटिक शिला स्तंभ से नरसिंह प्राकट्य
जब क्रुद्ध हिरण्यकश्यप ने तलवार खींचकर पूछा: “बता तेरा नारायण कहाँ है? क्या इस खंभे में भी है?” प्रह्लाद ने निर्भय होकर कहा: “हां, वे जल, थल, चर, अचर और इस खंभे में भी विद्यमान हैं।” हिरण्यकश्यप ने जैसे ही खंभे पर प्रहार किया, गगनभेदी गर्जना के साथ आधा नर और आधा सिंह स्वरूप धारण कर भगवान नरसिंह प्रकट हुए। उन्होंने हिरण्यकश्यप को संध्याकाल में (न दिन न रात), देहरी पर (न अंदर न बाहर), अपनी जांघों पर रखकर (न भूमि न आकाश) अपने नाखूनों से (न अस्त्र न शस्त्र) विदीर्ण कर भक्त की रक्षा की।
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