भगवद्गीता में कर्म योग — निष्काम कर्म, 'समत्वं योग उच्यते' एवं जीवन-प्रबंधन
कर्म का संन्यास नहीं, फल की आसक्ति का संन्यास — कर्म को ही ईश्वर पूजा बनाने का मार्ग
भगवद्गीता में कर्म योग — निष्काम कर्म, 'समत्वं योग उच्यते' एवं जीवन-प्रबंधन (Audio)
भगवद्गीता में कर्म योग — निष्काम कर्म, 'समत्वं योग उच्यते' एवं जीवन-प्रबंधन पाठ
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥
गीता सूत्र (2.48): हे धनंजय! आसक्ति का त्याग करके तथा सफलता और असफलता में समान भाव रखकर अपने कर्तव्यों का पालन करो। यही समत्व भाव ही ‘योग’ कहलाता है।
भगवद्गीता में कर्म योग — निष्काम कर्म, 'समत्वं योग उच्यते' एवं जीवन-प्रबंधन का महत्व एवं आध्यात्मिक लाभ
💼 निष्काम कर्म का वास्तविक व्यावहारिक अर्थ
कर्मयोग का अर्थ यह नहीं है कि कार्य बिना सोचे-समझे किया जाए, बल्कि इसका अर्थ है कि कर्म करते समय अपनी 100% एकाग्रता, दक्षता और ईमानदारी उस कार्य में लगाई जाए (“योगः कर्मसु कौशलम्”), परंतु उसके परिणाम (सफलता या असफलता) को ईश्वर का विधान मानकर शांत रहा जाए। जब परिणाम की चिंता हट जाती है, तो कार्य में उत्कृष्टता स्वयं ही आ जाती है।
🌟 कर्म बंधन से मुक्ति का रहस्य
मनुष्य कर्म करने से नहीं बंधता, बल्कि कर्म के साथ जुड़े अहंकार (“यह मैंने किया”) और फल की तृष्णा से बंधता है। जब हर कार्य समाज, परिवार और ईश्वर की सेवा मानकर किया जाता है, तो वही सांसारिक कर्म मोक्ष का साधन बन जाता है।
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