
कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्।
सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥
भावार्थ: जो कर्पूर के समान धवल, करुणा के साक्षात अवतार, संसार के समस्त तत्वों के मूल सार और भुजंगों की माला धारण करने वाले हैं, उन भगवान शिव को माता भवानी सहित मैं अपने हृदय में नमन करता हूँ।
भूमिका: त्याग और सर्वकल्याण की अमर गाथा
सनातन धर्म के पुराणों में भगवान शिव के अनेक पावन चरित्रों का वर्णन मिलता है, किंतु ‘नीलकंठ’ स्वरूप की गाथा केवल एक पौराणिक कथा नहीं, अपितु सम्पूर्ण मानवता के लिए निस्वार्थ सेवा, परम त्याग और विश्व कल्याण का सर्वोच्च संदेश है। जब ब्रह्मांड पर महाविनाश का संकट गहराया, समस्त देव-दानव प्राण रक्षा हेतु त्राहि-त्राहि कर उठे, तब केवल और केवल देवाधिदेव महादेव ने आगे बढ़कर सृष्टि को अपने आंचल में समेट लिया।
दुर्वासा ऋषि का शाप और समुद्र मंथन की पृष्ठभूमि
श्रीमद्भागवत एवं शिवपुराण के अनुसार, एक बार महर्षि दुर्वासा ने देवराज इंद्र को भगवान विष्णु की पावन पारिजात पुष्पमाला भेंट की। इंद्र ने अहंकारवश उस दिव्य माला को अपने ऐरावत हाथी के मस्तक पर रख दिया। ऐरावत ने गंध से उत्तेजित होकर माला को सूंड से खींचकर पृथ्वी पर पटक दिया और पैरों तले कुचल दिया।
इस अपमान से अत्यंत कुपित होकर महर्षि दुर्वासा ने इंद्र को शाप दिया कि तुम्हारा समस्त वैभव, पराक्रम और तीनों लोकों की श्री (लक्ष्मी) नष्ट हो जाएगी। शाप के प्रभाव से देवलोक श्रीहीन हो गया, देवता निर्बल हो गए और दैत्यों के राजा बलि ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया। अपनी खोई हुई शक्ति पुनः प्राप्त करने हेतु सभी देवता ब्रह्मा जी के साथ भगवान श्रीहरि विष्णु की शरण में पहुंचे। श्रीहरि ने उन्हें असुरों के साथ मिलकर क्षीरसागर का मंथन कर अमृत प्राप्त करने का परामर्श दिया।

क्षीरसागर का महामंथन और चौदह रत्नों का प्राकट्य
क्षीरसागर के मंथन हेतु मंदराचल पर्वत को मथानी तथा नागराज वासुकि को नेती (रस्सी) बनाया गया। पर्वत के डूबने पर स्वयं भगवान विष्णु ने ‘कूर्म’ (कच्छप) अवतार लेकर उसे अपनी विशाल पीठ पर स्थापित किया। एक ओर देवगण नागराज के पुच्छ भाग को पकड़े हुए थे, तो दूसरी ओर असुर मुख भाग की ओर थे।
इस महामंथन से कामधेनु गाय, उच्चैःश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष, अप्सरा रंभा, माँ महालक्ष्मी, वारुणी, शंख, चंद्रमा, हरिधनुष, अमृत कलश आदि दिव्य रत्न प्रकट हुए। किंतु इन अमृत रत्नों से पूर्व सागर के गर्भ से एक ऐसा भयंकर विष प्रकट हुआ जिसने समस्त सृष्टि की नींव हिला दी।
कालकूट हलाहल विष का प्राकट्य और महाविनाश का भय
मंथन के प्रारंभ में समुद्र के गर्भ से प्रलयंकारी कालकूट (हलाहल) विष उफनने लगा। यह विष इतना प्रचंड और विषाक्त था कि इसकी लपटों और धुएं मात्र से दसों दिशाएं जलने लगीं। जलचर भस्म होने लगे, वनस्पति झुलसने लगी और देवताओं व असुरों की त्वचा तक जलने लगी।
समस्त ब्रह्मांड का विनाश निश्चित देखकर देव और असुर दोनों ही अपनी शत्रुता भूलकर भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी के पास दौड़े। तब भगवान विष्णु ने कहा— “इस कालकूट विष को शांत करने की शक्ति केवल देवाधिदेव महादेव के पास है। वही औढरदानी हैं, वही जगतपिता हैं। चलो, कैलाशपति शिव की शरण में चलें।”
महादेव द्वारा हलाहल का पान और माँ पार्वती का सहयोग
जब समस्त चराचर जगत के प्राणी व्याकुल होकर कैलाश पहुंचे, तो भोलेनाथ ने उनकी करुण पुकार सुनी। भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए कहा— “संसार की रक्षा करना ही ईश्वरीय धर्म है। यदि मेरे विष पीने से निर्दोष प्राणियों की रक्षा होती है, तो यह विष मेरे लिए अमृत के समान है।”
महादेव ने अंजलि में उस भयंकर उबलते हुए हलाहल विष को भर लिया और भगवान श्रीहरि का स्मरण करते हुए उसे एक ही घूंट में पी लिया। किंतु विष की तीव्रता इतनी अधिक थी कि यदि वह शिव जी के उदर (पेट) में उतर जाता तो संपूर्ण ब्रह्मांड जो उनके उदर में स्थित है, नष्ट हो जाता।
तभी जगतजननी माँ पार्वती ने अत्यंत फुर्ती से अपने दोनों कोमल हाथों से भगवान शिव के कंठ (गले) को दबा लिया। माँ पार्वती के इस मातृवत स्पर्श से विष शिव जी के कंठ में ही ठहर गया, वह न नीचे उदर में जा सका और न बाहर निकल सका।
‘नीलकंठ’ नामकरण और चंद्रमा धारण का पावन रहस्य
उस महाविष के तीव्र प्रभाव से भगवान शिव का सुंदर कंठ नीला पड़ गया। उसी दिन से तीनों लोकों में भगवान शिव का एक नया, परम पावन नाम प्रसिद्ध हुआ— ‘नीलकंठ महादेव’।
विष की भयंकर उष्णता (गर्मी) से महादेव के शरीर में असह्य ताप उत्पन्न होने लगा। भोलेनाथ के ताप को शांत करने के लिए देवताओं ने उनके मस्तक पर शीतल चंद्रमा को स्थापित किया। इसके साथ ही, माँ गंगा की शीतल पावन धारा उनकी जटाओं में प्रवाहित हुई और देवताओं ने उन्हें शीतल जल, बेलपत्र, धतूरा और भांग अर्पित किए। यही कारण है कि आज भी भगवान शिव की पूजा में शीतल जल से अभिषेक और बेलपत्र चढ़ाने का अत्यंत विशेष महत्व माना जाता है।
कथा का आध्यात्मिक रहस्य एवं जीवन दर्शन
समुद्र मंथन और नीलकंठ महादेव की यह पावन कथा केवल ऐतिहासिक घटना नहीं है, अपितु प्रत्येक मानव के अंतःकरण का दर्शन कराती है:
- जीवन रूपी समुद्र: हमारा मन ही क्षीरसागर है, जहाँ दैवी और आसुरी दोनों प्रकार की वृत्तियां निरंतर मंथन करती हैं।
- विष पहले, अमृत बाद में: किसी भी महान कार्य अथवा साधना के प्रारंभ में कठिनाइयां, आलोचना और कष्ट (विष) पहले आते हैं। जो व्यक्ति इन कठिनाइयों को धैर्यपूर्वक सह लेता है, वही अंत में सफलता का अमृत प्राप्त करता है।
- कंठ में विष रोकना: भगवान शिव हमें सिखाते हैं कि समाज या परिवार से मिलने वाले कटु वचनों, क्रोध और कड़वाहट (विष) को न तो बाहर उगलकर दूसरों को चोट पहुंचानी चाहिए, और न ही दिल में रखकर स्वयं को जलाना चाहिए; बल्कि उसे विवेक के कंठ में रोककर शांत कर लेना चाहिए।
निष्कर्ष एवं पावन प्रार्थना
भगवान नीलकंठ महादेव का यह स्वरूप हमें यह सिखाता है कि शक्ति का वास्तविक उद्देश्य दूसरों पर अधिकार जमाना नहीं, बल्कि असहायों की रक्षा करना और जगत के विष को स्वयं पीकर अमृत बांटना है।
हे नीलकंठेश्वर, हे त्रिलोकीनाथ! जैसे आपने समुद्र मंथन के समय समस्त ब्रह्मांड के संकट को हर लिया था, वैसे ही हमारे जीवन के समस्त संताप, भय और पापों का हरण कर हमें सद्बुद्धि, शांति एवं भक्ति का वरदान प्रदान करें। ॐ नमः शिवाय! जय नीलकंठ महादेव!