
गाङ्गं वारि मनोहारि मुरारिचरणच्युतम्।
त्रिपुरारिशिरश्चारि पापहारि पुनातु माम्॥
भावार्थ: जो श्रीहरि विष्णु के पावन श्रीचरणों से निःसृत हुई हैं, देवाधिदेव भगवान शिव के मस्तक की शोभा बढ़ाती हैं और संसार के समस्त पापों का हरण करने वाली हैं—वे मनोहारी मां गंगा हम सभी को पवित्र करें।
भूमिका
सनातन हिंदू परंपरा में मां गंगा केवल एक भौतिक नदी नहीं हैं, अपितु वे साक्षात पतित-पावनी, मोक्षदायिनी और देवभूमि भारत की आध्यात्मिक जीवनधारा हैं। अनादि काल से भारतीय जनमानस के जन्म, संस्कार, पूजा-अर्चना और अंतिम विदाई तक प्रत्येक पग पर गंगाजल की उपस्थिति अनिवार्य मानी गई है। पुराणों में गंगा को स्वर्ग की नदी ‘मंदाकिनी’, पाताल की नदी ‘भोगवती’ और मृत्युलोक (पृथ्वी) की पावन धारा ‘भागीरथी’ के रूप में त्रिपथगा कहा गया है।
किंतु जो गंगा कभी देवलोक में ब्रह्मदेव के कमंडल और भगवान विष्णु के पावन चरणों में निवास करती थीं, वे इस नश्वर धरातल पर कैसे अवतरित हुईं? इस परम पावन अवतरण के पीछे इक्ष्वाकु वंश के परम तपस्वी राजा भगीरथ की अदम्य साधना, उनके पूर्वजों की मुक्ति की करुण गाथा और देवाधिदेव भगवान शिव की असीम करुणा जुड़ी हुई है।
पौराणिक परंपरा के अनुसार, गंगा अवतरण की यह पावन गाथा केवल एक नदी के प्रवाह की कथा नहीं है; यह मनुष्य के दृढ़ संकल्प, पूर्वजों के प्रति कर्तव्य-बोध, त्याग और ईश्वर-कृपा का वह अमर संदेश है, जिसे सुनकर आज भी करोड़ों सनातनी श्रद्धालु स्वयं को धन्य अनुभव करते हैं।
राजा सगर और उनके साठ हजार पुत्र
पौराणिक इतिहास के अनुसार, सतयुग में अयोध्या के सूर्यवंश में चक्रवर्ती राजा सगर का शासन था। राजा सगर अत्यंत धर्मपरायण, शूरवीर और प्रजापालक नरेश थे। उनके राज्य में प्रजा सुखी, समृद्ध और धर्म के मार्ग पर चलने वाली थी।
राजा सगर की दो रानियां थीं— महारानी केशिनी और महारानी सुमति। महर्षि कश्यप के आशीर्वाद से महारानी केशिनी से असमंजस नामक एक पराक्रमी पुत्र का जन्म हुआ, जिनसे आगे चलकर अंशुमान का जन्म हुआ। वहीं, महारानी सुमति से साठ हजार बलवान और प्रतापी पुत्रों का जन्म हुआ।
राजा सगर के ये साठ हजार पुत्र असीम पराक्रमी थे। किंतु विपुल सैन्य बल और अपार शक्ति के कारण धीरे-धीरे उनके भीतर अहंकार का उदय होने लगा। वे तीनों लोकों में अपने बाहुबल का प्रदर्शन करने लगे, जिससे ऋषि-मुनि और सामान्य जन सशंकित रहने लगे।
अश्वमेध यज्ञ और यज्ञ के घोड़े की खोज
राजा सगर ने अपने चक्रवर्ती साम्राज्य की प्रतिष्ठा और धर्म-स्थापना हेतु सौ अश्वमेध यज्ञ करने का विराट संकल्प लिया। उनके निन्यानवे यज्ञ सफलतापूर्वक संपन्न हो चुके थे। जब सौवें अश्वमेध यज्ञ का पावन आयोजन प्रारंभ हुआ, तो देवराज इंद्र अत्यंत भयभीत हो उठे।
वैदिक परंपरा में ऐसी मान्यता रही है कि सौ अश्वमेध यज्ञ पूर्ण करने वाला सम्राट इंद्र के पद का अधिकारी बन सकता है। अपने सिंहासन को संकट में देखकर देवराज इंद्र ने यज्ञ में विघ्न डालने का निश्चय किया। वे गुप्त रूप से अयोध्या की यज्ञशाला में प्रविष्ट हुए और यज्ञ के मुख्य साधन— सुसज्जित पावन अश्व का हरण कर ले गए।
इंद्र ने उस यज्ञीय अश्व को पृथ्वी के सुदूर पाताल लोक में ले जाकर महर्षि कपिल के शांत तपोवन में एक वृक्ष के पीछे बांध दिया। उस समय महर्षि कपिल गहन समाधि में लीन थे और उन्हें बाह्य जगत की किसी भी घटना का भान नहीं था।

यज्ञीय अश्व के सहसा अदृश्य हो जाने से यज्ञशाला में हड़कंप मच गया। यज्ञ का अश्व खो जाने का अर्थ था यज्ञ का खंडित होना, जो कि किसी भी चक्रवर्ती राजा के लिए घोर अपमान और अमंगल का विषय था।
राजा सगर ने अपने साठ हजार पुत्रों को आदेश दिया कि वे संपूर्ण ब्रह्मांड में जाकर अश्व की खोज करें और यज्ञ को पूर्ण कराएं। पिता की आज्ञा पाकर साठ हजार सगर-पुत्र गर्व से भरकर अश्व की तलाश में चारों दिशाओं में निकल पड़े।
कपिल मुनि के आश्रम का प्रसंग
सगर-पुत्रों ने पृथ्वी के प्रत्येक पर्वत, वन, द्वीप और नदी तट की छानबीन की, किंतु अश्व का कोई सुराग नहीं मिला। अंततः, उन्होंने अपने अस्त्र-शस्त्रों से पृथ्वी को खोदना प्रारंभ किया। पृथ्वी को विदीर्ण करते हुए वे पाताल लोक की गहराइयों में जा पहुंचे।
पाताल लोक में विचरण करते हुए उन्हें एक दिव्य, शांत और ज्योतिर्मय आश्रम दिखाई दिया। वहां साक्षात भगवान विष्णु के अंशावतार महर्षि कपिल नेत्र बंद किए परम शांत समाधि में बैठे हुए थे। आश्रम के निकट ही राजा सगर का वह खोया हुआ यज्ञीय अश्व शांतिपूर्वक घास चर रहा था।
अश्व को देखते ही सगर-पुत्रों का विवेक अहंकार के वशीभूत होकर नष्ट हो गया। उन्होंने विचार किए बिना ही महर्षि कपिल को अश्व का चोर मान लिया। वे क्रोध में भरकर मुनि की ओर दौड़े और अपशब्द कहते हुए अपने अस्त्र-शस्त्र तान दिए।
सगर-पुत्रों के भारी कोलाहल और धृष्टता से महर्षि कपिल की समाधि भंग हो गई। जैसे ही मुनि ने अपने तेजस्वी नेत्र खोले, उनके तपोबल और आत्मिक तेज से ऐसी प्रचंड प्रलयंकारी अग्नि प्रज्वलित हुई कि कुछ ही क्षणों में राजा सगर के समस्त साठ हजार पुत्र जलकर भस्म के ढेर में परिवर्तित हो गए।
सगर-पुत्रों की मुक्ति का प्रश्न
अयोध्या में जब दीर्घ काल तक सगर-पुत्र वापस नहीं लौटे, तो राजा सगर अत्यंत चिंतित हो उठे। उन्होंने अपने पौत्र अंशुमान (असमंजस के पुत्र) को अश्व और राजकुमारों की खोज के लिए भेजा।
अंशुमान अत्यंत विनीत, धर्मनिष्ठ और साहसी राजकुमार थे। वे सगर-पुत्रों द्वारा खोदे गए मार्ग से होते हुए पाताल लोक में महर्षि कपिल के आश्रम पहुंचे। वहां उन्होंने शांत भाव से महर्षि कपिल के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया और हाथ जोड़कर विनयपूर्वक स्तुति की।
अंशुमान की नम्रता और भक्ति से प्रसन्न होकर महर्षि कपिल ने कहा— “वत्स! तुम्हारा यज्ञीय अश्व यहीं है, इसे ले जाकर अपने पितामह का यज्ञ पूर्ण कराओ। किंतु तुम्हारे तात (सगर-पुत्र) अपने अहंकार और उद्दंडता के कारण मेरे तेज से भस्म हो चुके हैं।”
अंशुमान ने जब वहां भस्म का विशाल पर्वत देखा, तो उनका हृदय हाहाकार कर उठा। अकाल मृत्यु और श्राप के कारण सगर-पुत्रों का दाह-संस्कार, तर्पण अथवा श्राद्ध नहीं हो सका था। वे प्रेत योनि में भटक रहे थे।
तभी वहां पक्षीराज गरुड़ (जो सगर-पुत्रों के मातुल भी थे) प्रकट हुए। गरुड़ जी ने अंशुमान को समझाते हुए कहा— “हे अंशुमान! साधारण लौकिक जल से इन साठ हजार आत्माओं का तर्पण संभव नहीं है। यदि स्वर्गलोक से साक्षात देवनदी गंगा का इस पृथ्वी पर अवतरण हो और उनकी पावन धारा इन भस्म-अवशेषों का स्पर्श करे, तभी तुम्हारे पूर्वजों को मोक्ष और सद्गति प्राप्त हो सकती है।”
अंशुमान और दिलीप के प्रयास
अंशुमान ने लौटकर राजा सगर को संपूर्ण वृत्तांत सुनाया और अश्व सौंपकर यज्ञ संपन्न कराया। पुत्रों के वियोग से व्यथित राजा सगर ने तीस हजार वर्षों तक धर्मपूर्वक राज्य किया और अंत में परलोक सिधार गए।
इसके पश्चात राजा अंशुमान ने अपने पूर्वजों की मुक्ति हेतु राजकाज अपने पुत्र दिलीप को सौंपकर हिमालय के वनों में घोर तपस्या प्रारंभ की। अंशुमान ने जीवन पर्यंत कठोर साधना की, किंतु वे गंगा को पृथ्वी पर लाने में सफल न हो सके।
अंशुमान के उपरांत उनके धर्मात्मा पुत्र राजा दिलीप ने भी राजसिंहासन का भार संभालते हुए निरंतर गंगा अवतरण के उपाय किए। उन्होंने भी अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए वर्षों तक हिमालय की कंदराओं में कठिन व्रत और तपस्याएं कीं। किंतु विधाता का विधान कुछ और ही था; राजा दिलीप भी अपने जीवनकाल में मां गंगा को पृथ्वी पर न ला सके और शरीर त्याग कर देवलोक चले गए।
राजा भगीरथ का महान संकल्प
राजा दिलीप के पश्चात उनके तेजस्वी पुत्र भगीरथ अयोध्या के सिंहासन पर आसीन हुए। राजा भगीरथ बचपन से ही अपने पूर्वजों के अवसाद और उनकी मुक्ति की प्रतीक्षा की गाथाएं सुनते आ रहे थे।
उनके मन में यह तीव्र पीड़ा थी कि जिन पूर्वजों के कारण वे इस पावन कुल में जन्मे हैं, वे साठ हजार आत्माएं आज भी पाताल लोक में बिना सद्गति के तड़प रही हैं। भगीरथ ने विचार किया कि जब तक वे अपने पूर्वजों का उद्धार नहीं कर लेते, तब तक राजसी भोग, वैभव और सुख-सुविधाएं उनके लिए व्यर्थ हैं।
राजा भगीरथ ने एक ऐसा संकल्प लिया जिसकी कल्पना भी साधारण मनुष्य के लिए असंभव थी। उन्होंने राजकाज अपने योग्य मंत्रियों को सौंपा और स्वयं वल्कल वस्त्र धारण कर सन्यासी के रूप में हिमालय की ओर प्रस्थान कर दिया। सनातन इतिहास में किसी असंभव कार्य को अडिग निष्ठा से सिद्ध करने के प्रयास को इसी कारण सदा के लिए ‘भगीरथ प्रयास’ की संज्ञा दी गई।

भगीरथ की कठोर तपस्या
राजा भगीरथ ने हिमालय के अत्यंत दुर्गम तीर्थ गोकर्ण क्षेत्र में जाकर अपनी साधना प्रारंभ की। उनकी तपस्या की कठोरता अवर्णनीय थी। ग्रीष्म ऋतु में वे पंचाग्नि तप करते, शीत ऋतु में बर्फीले जल में खड़े रहते और वर्षा काल में खुले आकाश के नीचे निराहार साधना करते।
प्रारंभ में उन्होंने केवल कंद-मूल और फलों का सेवन किया। कालांतर में उन्होंने जल त्याग कर केवल सूखे पत्तों पर निर्वाह किया और अंत में वे केवल वायु पीकर एक पैर के अंगूठे पर खड़े होकर ऊर्ध्वबाहु होकर ब्रह्मदेव की आराधना में लीन हो गए।
हजारों वर्षों की इस अखंड साधना से भगीरथ का शरीर क्षीण हो गया, किंतु उनके मुखमंडल का तेज सूर्य के समान प्रदीप्त था। उनकी इस अद्वितीय निष्ठा और अटूट तपस्या से तीनों लोकों में हलचल मच गई।
मां गंगा का प्रकट होना
भगीरथ की अनन्य भक्ति और निष्काम तपस्या से संतुष्ट होकर सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा साक्षात प्रकट हुए। ब्रह्मा जी ने हंसवाहिनी पर आरूढ़ होकर मधुर वाणी में कहा— “हे राजन भगीरथ! उठो, तुम्हारी तपस्या पूर्ण हुई। तुम्हारे पूर्वज-प्रेम और कठोर साधना से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। वर मांगो, तुम्हारी क्या अभिलाषा है?”
राजा भगीरथ ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से ब्रह्मा जी के चरणों में वंदना की और कहा— “हे परमपिता! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मुझे केवल यही वरदान दीजिए कि स्वर्गलोक में प्रवाहित होने वाली देवनदी मां गंगा पृथ्वी पर अवतरित हों, ताकि उनके पावन स्पर्श से मेरे भस्म हुए पूर्वजों को मुक्ति प्राप्त हो सके।”
ब्रह्मा जी ने मंद मुस्कान के साथ कहा— “तथास्तु! मैं गंगा को पृथ्वी पर भेजने के लिए तत्पर हूँ। किंतु राजन, इसके मार्ग में एक अत्यंत विकट संकट है।”
पृथ्वी पर गंगा के अवतरण की चुनौती
भगवान ब्रह्मा ने भगीरथ को गंगा अवतरण की उस गंभीर चुनौती से अवगत कराया, जिसे जानना अत्यंत आवश्यक था। ब्रह्मा जी ने कहा:
“हे भगीरथ! जब मां गंगा देवलोक से अत्यंत तीव्र गति से पृथ्वी पर गिरेंगी, तो उनके जल का वेग इतना भयंकर और प्रलयंकारी होगा कि यह समस्त पृथ्वी उसे सहन नहीं कर पाएगी। गंगा के प्रचंड आघात से पृथ्वी विदीर्ण होकर पाताल लोक में समा जाएगी। संपूर्ण चराचर जगत में त्राहि-त्राहि मच जाएगी।”
ब्रह्मा जी ने समाधान बताते हुए कहा— “समस्त ब्रह्मांड में केवल देवाधिदेव महादेव ही ऐसे समर्थ देव हैं, जो गंगा के इस उन्मुक्त और प्रचंड वेग को अपने मस्तक पर धारण कर सकते हैं। अतः तुम कैलाशपति भगवान शिव की शरण में जाओ और उनसे प्रार्थना करो कि वे गंगा को अपनी जटाओं में संभाल लें।”
भगवान शिव की आराधना
ब्रह्मा जी के वचनों को शिरोधार्य कर राजा भगीरथ तनिक भी निराश नहीं हुए। उन्होंने पुनः अपनी साधना का दूसरा चरण प्रारंभ किया। इस बार उनका आराध्य कोई और नहीं, अपितु औढरदानी, आशुतोष भगवान शिव थे।
भगीरथ ने कैलाश के समीप जाकर एक वर्ष तक बिना अन्न-जल ग्रहण किए, दोनों हाथ जोड़कर केवल एक पैर पर खड़े होकर भगवान शिव का ध्यान किया। वे निरंतर ‘ॐ नमः शिवाय’ और पंचाक्षर मंत्र का जप करते रहे। जैसे भगवान शिव ने समुद्र मंथन के समय कालकूट विष पीकर सृष्टि की रक्षा की थी, वैसे ही भगीरथ को विश्वास था कि केवल महादेव ही इस संकट से धरती को बचा सकते हैं।
भगीरथ के इस अगाध समर्पण को देखकर करुणासागर भगवान शिव प्रकट हुए और बोले— “हे राजन भगीरथ! मैं तुम्हारी पितृभक्ति और निष्ठा से परम संतुष्ट हूँ। जगत के कल्याण और तुम्हारे पूर्वजों के उद्धार हेतु मैं स्वर्ग से गिरती गंगा को अपने मस्तक पर धारण करने की प्रतिज्ञा करता हूँ।”
भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया
भगवान शिव की स्वीकृति मिलते ही स्वर्ग के द्वार खुल गए और मां गंगा का विराट, दिव्य और स्वर्णिम जलप्रपात आकाश से नीचे की ओर उमड़ पड़ा। उस समय गंगा के मन में तनिक गर्व (अहंकार) का भाव उत्पन्न हुआ। गंगा ने विचार किया कि वे अपने असीम प्रवाह के बल से भगवान शिव को भी बहा ले जाएंगी और पाताल में फेंक देंगी।
अंतर्यामी भगवान शिव गंगा के इस दर्प को क्षण भर में ताड़ गए। जैसे ही प्रलयंकारी गर्जना करती हुई गंगा की अरबों धाराएं आकाश से गिरीं, भगवान शिव ने अपने विराट स्वरूप का विस्तार किया और अपनी घनी, सघन जटाओं को फैला दिया।
गंगा की संपूर्ण महाप्रलयंकारी जलराशि सीधे भगवान शिव की जटाओं के महाजाल में समा गई। गंगा शिव जी की जटाओं के चक्रव्यूह में ऐसी उलझीं कि लाख प्रयास करने के उपरांत भी उन्हें बाहर निकलने का कोई मार्ग नहीं मिला। उनका सारा गर्व और वेग शिव की जटाओं में विलीन होकर शांत हो गया।
जब गंगा कई वर्षों तक बाहर नहीं निकलीं, तो भगीरथ पुनः व्याकुल हो उठे। उन्होंने हाथ जोड़कर आशुतोष महादेव की करुण स्तुति की, जिसे पुराणों में शिव तांडव और गंगा स्तुति के रूप में स्मरण किया जाता है। भगीरथ की प्रार्थना पर महादेव का हृदय पिघल गया।
भगवान शिव ने अपनी जटाओं से एक लट को तनिक ढीला किया और मां गंगा की पवित्र जलधारा को सात अत्यंत शांत, अमृतमयी धाराओं के रूप में पृथ्वी पर मुक्त कर दिया। इनमें से तीन धाराएं पूर्व की ओर, तीन पश्चिम की ओर और मुख्य पावन धारा भगीरथ के पीछे-पीछे प्रवाहित हुई।

भगीरथ के पीछे गंगा की यात्रा
गंगा के पृथ्वी पर अवतरित होते ही संपूर्ण दिशाएं पावन हो उठीं। राजा भगीरथ आगे-आगे अपने दिव्य रथ पर शंख बजाते हुए चल रहे थे और मां गंगा एक स्नेहमयी पुत्री की भांति उनके पीछे-पीछे कल-कल निनाद करती हुई बह रही थीं।
मार्ग में जहां-जहां गंगा का जल पहुंचा, वहां की सूखी धरती हरी-भरी हो गई। वन, उपवन और ऋषि-मुनियों के आश्रम खिल उठे। देवताओं, गंधर्वों, यक्षों और अप्सराओं ने आकाश से पुष्प वर्षा कर पृथ्वी के इस परम पावन क्षण का अभिनंदन किया।
ऋषि जाह्नु और जाह्नवी नाम की परंपरा
यात्रा के मध्य में एक अत्यंत रोचक और महत्वपूर्ण प्रसंग आया। मार्ग में परम तपस्वी महर्षि जाह्नु का आश्रम था, जहां वे एक विशाल वैदिक यज्ञ संपन्न कर रहे थे।
गंगा के चंचल और विशाल प्रवाह ने खेल-खेल में मुनि के आश्रम और संपूर्ण यज्ञ मंडप को जलमग्न कर दिया। यज्ञ सामग्री बह जाने से महर्षि जाह्नु अत्यंत कुपित हो गए। उन्होंने अपनी योगशक्ति का प्रयोग कर एक ही घूंट (आचमन) में गंगा के संपूर्ण जल का पान कर लिया।
गंगा के पुनः अदृश्य हो जाने से राजा भगीरथ स्तब्ध रह गए। वे मुनि जाह्नु के चरणों में गिर पड़े और हाथ जोड़कर विलाप करते हुए अपने पूर्वजों के उद्धार का उद्देश्य समझाया। अन्य ऋषि-मुनियों और देवताओं ने भी मुनि से क्षमा-याचना की।
महर्षि जाह्नु का क्रोध शांत हुआ। उन्होंने भगीरथ की धर्मनिष्ठा का सम्मान करते हुए अपने दाएं कान (अथवा जंघा) से गंगा के जल को पुनः मुक्त कर दिया। चूंकि महर्षि जाह्नु ने गंगा को पुनः अपने शरीर से उत्पन्न किया था, इसलिए उन्होंने गंगा को अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया। उसी दिन से मां गंगा का एक प्रसिद्ध और पावन नाम ‘जाह्नवी’ पड़ा।
सगर-पुत्रों की मुक्ति
मुनि जाह्नु के आश्रम से आगे बढ़ते हुए मां गंगा भगीरथ के पीछे-पीछे बंगाल के सागर संगम (वर्तमान गंगासागर) तक पहुंचीं। वहां से वे सीधे पाताल लोक की उस गहरी खाई में उतर गईं, जहां राजा सगर के साठ हजार पुत्रों की भस्म का विशाल ढेर युगों से पड़ा हुआ था।
जैसे ही मां गंगा के अमृततुल्य, पावन और दिव्य जल ने उन भस्म-कणों का स्पर्श किया, एक अलौकिक चमत्कार घटित हुआ। युगों से प्रेत योनि में जल रहे साठ हजार राजकुमार तत्काल समस्त पापों और बंधनों से मुक्त हो गए।
वे सभी राजकुमार दिव्य रूप धारण कर सुंदर विमानों में आरूढ़ हुए और राजा भगीरथ को कृतज्ञतापूर्वक आशीर्वाद देते हुए सीधे स्वर्गलोक को प्रस्थान कर गए। इस प्रकार भगीरथ के पूर्वजों की पीढ़ियों की साधना और अभिलाषा पूर्ण हुई।
गंगा को ‘भागीरथी’ क्यों कहा जाता है?
सगर-पुत्रों के उद्धार के उपरांत स्वयं भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर भगीरथ के इस पराक्रम की मुक्त कंठ से प्रशंसा की। ब्रह्मा जी ने वरदान दिया:
“हे भगीरथ! जब तक इस पृथ्वी पर सूर्य और चंद्रमा का प्रकाश रहेगा, तब तक यह देवनदी तुम्हारे नाम से संसार में पूजी जाएगी। तुम्हारे इस अलौकिक पुरुषार्थ और अनन्य भक्ति के कारण गंगा का प्रमुख नाम ‘भागीरथी’ होगा। जो मनुष्य भागीरथी का स्मरण, दर्शन अथवा आचमन करेगा, वह तीनों तापों से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त होगा।”
कथा का शास्त्रीय संदर्भ
गंगा अवतरण की यह पावन कथा सनातन हिंदू धर्म के अनेक प्रमाणिक एवं पूज्य ग्रंथों में विस्तार से वर्णित है:
- वाल्मीकि रामायण: बालकाण्ड के सर्ग ३८ से ४४ तक महर्षि विश्वामित्र ने भगवान श्रीराम और लक्ष्मण जी को गंगा अवतरण और सगर-चरित्र की यह संपूर्ण कथा सुनाई है।
- महाभारत: वनपर्व (अध्याय १०६ से १०९) में लोमश ऋषि ने पांडवों को उनके तीर्थाटन के समय भगीरथ की तपस्या और गंगा अवतरण का वृत्तांत सुनाया है।
- श्रीमद्भागवत महापुराण: नवम स्कंध के अध्याय ९ में सूर्यवंश के वर्णन के अंतर्गत राजा सगर, भगीरथ और गंगा के पाताल गमन का अत्यंत सुंदर आध्यात्मिक वर्णन मिलता है।
- शिव पुराण एवं विष्णु पुराण: इन दोनों महापुराणों में भगवान शिव द्वारा गंगा को जटाओं में धारण करने और गंगा के त्रिपथगा स्वरूप का विस्तृत उल्लेख है।
गंगा अवतरण की कथा से मिलने वाली शिक्षाएं
गंगा अवतरण की यह पौराणिक गाथा मात्र एक प्राचीन आख्यान नहीं है, अपितु जीवन को दिशा देने वाला एक महान दर्शन है। इससे हमें निम्नलिखित अमूल्य शिक्षाएं प्राप्त होती हैं:
१. अदम्य संकल्प और निरंतरता: भगीरथ ने असंभव समझे जाने वाले कार्य को संभव कर दिखाया। यदि मनुष्य के पास दृढ़ इच्छाशक्ति हो, तो वह ईश्वर को भी प्रसन्न कर सकता है।
२. पूर्वजों और माता-पिता के प्रति कर्तव्य: भगीरथ ने अपने पुरखों की मुक्ति के लिए संपूर्ण राजसी सुखों का परित्याग कर दिया। यह कथा हमें पितृ-ऋण और पारिवारिक दायित्वों का बोध कराती है।
३. अहंकार का शमन और विनम्रता: सगर-पुत्रों का अहंकार मुनि के तेज से भस्म हुआ, और गंगा का अहंकार शिव की जटाओं में शांत हुआ। यह सिखाता है कि शक्ति चाहे जितनी हो, अहंकार सदा पतन का कारण बनता है।
४. विवेक और संतुलन: गंगा का प्रचंड वेग केवल भगवान शिव की करुणा और संयम से ही संभाला जा सका। जीवन में ऊर्जा कितनी भी प्रबल हो, यदि उसे विवेक का संयम न मिले तो वह सृजन के स्थान पर प्रलय बन जाती है।
हिंदू परंपरा में गंगा का महत्व
सनातन धर्म में गंगा को साक्षात देवी, मां और मोक्षदायिनी माना गया है। प्रतिवर्ष ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को ‘गंगा दशहरा’ का पावन पर्व अत्यंत श्रद्धा से मनाया जाता है, जो गंगा के पृथ्वी पर अवतरण का पावन स्मृति दिवस है।
हरिद्वार, प्रयागराज, काशी और गंगासागर जैसे पावन तीर्थ गंगा के तट पर ही स्थित हैं, जहां नित्य संध्या को होने वाली भव्य गंगा आरती विश्वभर के श्रद्धालुओं के अंतःकरण को भक्ति रस से सराबोर कर देती है। गंगाजल को कभी अशुद्ध नहीं माना जाता; यह जीवन के अंतिम क्षणों में मुख में देकर आत्मा की सद्गति का मार्ग प्रशस्त करता है।
निष्कर्ष
गंगा अवतरण की संपूर्ण कथा भक्ति, निष्काम कर्म, त्याग और दिव्य अनुग्रह का पावन संगम है। राजा भगीरथ की तपस्या हमें यह विश्वास दिलाती है कि जब उद्देश्य पवित्र हो और प्रयास में सच्चाई हो, तो प्रकृति और परमात्मा दोनों ही उस संकल्प को सिद्ध करने में सहायक बन जाते हैं।
आइए, हम सभी पतित-पावनी मां गंगा के पावन स्वरूप को नमन करें, उनके जल की पवित्रता की रक्षा का संकल्प लें और भगवान शिव की कृपा से अपने जीवन को पावन बनाएं। हर हर गंगे! नमामि गंगे! हर हर महादेव!
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
गंगा अवतरण की कथा क्या है?
गंगा अवतरण की कथा सूर्यवंशी राजा भगीरथ द्वारा अपने साठ हजार पूर्वजों (सगर-पुत्रों) की मुक्ति के लिए की गई घोर तपस्या का वृत्तांत है। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी और भगवान शिव की कृपा से स्वर्गलोक की नदी गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुईं और सगर-पुत्रों को मोक्ष प्रदान किया।
राजा भगीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए क्या किया?
राजा भगीरथ ने अपना संपूर्ण राजपाट त्यागकर हिमालय के वनों में हजारों वर्षों तक निराहार रहकर एक पैर पर खड़े होकर ब्रह्मा जी और भगवान शिव की अत्यंत कठोर तपस्या (भगीरथ प्रयास) की, जिससे प्रसन्न होकर दोनों देवों ने गंगा के अवतरण का मार्ग प्रशस्त किया।
भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में क्यों धारण किया?
स्वर्ग से गिरते समय गंगा का वेग इतना प्रचंड और तीव्र था कि पृथ्वी उसका आघात सहन नहीं कर सकती थी और पाताल में धंस जाती। केवल भगवान शिव ही उस असीम वेग को संभालने में समर्थ थे, इसलिए उन्होंने गंगा को अपनी जटाओं में समाहित कर उनके प्रवाह को शांत किया।
गंगा को ‘भागीरथी’ क्यों कहा जाता है?
राजा भगीरथ के अद्वितीय पुरुषार्थ, तपस्या और त्याग के कारण ही मां गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर आईं। ब्रह्मा जी के वरदान और भगीरथ के सम्मान में गंगा को सदा के लिए ‘भागीरथी’ नाम से विभूषित किया गया।
गंगा को ‘जाह्नवी’ क्यों कहा जाता है?
पृथ्वी पर प्रवाह के दौरान गंगा ने महर्षि जाह्नु का आश्रम जलमग्न कर दिया था, जिससे कुपित होकर मुनि ने उनका समस्त जल पी लिया। बाद में भगीरथ की विनती पर मुनि ने गंगा को अपने कान से विसर्जित किया और उन्हें अपनी पुत्री माना, जिससे उनका नाम ‘जाह्नवी’ पड़ा।