
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
भावार्थ: घुमावदार सूंड वाले, विशाल शरीर वाले और करोड़ों सूर्यों के समान दिव्य तेज से दैदीप्यमान हे भगवान श्री गणेश! कृपा करके मेरे समस्त शुभ कार्यों को सदा बाधा-रहित (निर्विघ्न) संपन्न करें।
भूमिका: बुद्धि, विवेक और मातृ-पितृ भक्ति की अनुपम कथा
सनातन परंपरा में किसी भी शुभ कार्य, पूजा-अनुष्ठान, गृह-प्रवेश अथवा नवीन उद्यम के प्रारंभ में सर्वप्रथम भगवान श्री गणेश जी की आराधना की जाती है। वे ‘प्रथम पूज्य’ हैं। किंतु क्या आपने कभी विचार किया है कि भगवान गणेश जी को समस्त देवी-देवताओं में अग्रपूज्य (प्रथम पूज्य) का यह सर्वोच्च स्थान कैसे प्राप्त हुआ?
शिवपुराण और गणेशपुराण में वर्णित यह पावन कथा केवल शारीरिक बल या तेज गति की नहीं, बल्कि अद्वितीय बुद्धि, विवेक और माता-पिता के प्रति अटूट श्रद्धा का वह पावन आदर्श है जो कलयुग में हर संतान के लिए प्रेरणा का प्रकाश स्तंभ है।
देवसभा का धर्मसंकट: प्रथम पूज्य पद की प्रतियोगिता
पौराणिक काल की बात है। एक बार देवलोक में सभी देवताओं के मध्य इस बात पर गहन विवाद उत्पन्न हो गया कि समस्त चराचर जगत में किस देवता की पूजा सबसे पहले की जानी चाहिए? प्रत्येक देवता स्वयं को श्रेष्ठ, बलवान और पराक्रमी सिद्ध करने में लगे थे।
जब इस समस्या का कोई सर्वसम्मत समाधान नहीं निकला, तो सभी देवता देवर्षि नारद के साथ कैलाश पर्वत पर देवाधिदेव महादेव और माता पार्वती के समक्ष उपस्थित हुए। भगवान शिव ने समस्त देवगणों की व्यथा सुनी और एक अत्यंत धर्मसम्मत निर्णय लिया।
महादेव ने कहा— “देवगणों! जो भी देवता अपने वाहन पर सवार होकर इस संपूर्ण ब्रह्मांड की तीन बार परिक्रमा करके सबसे पहले कैलाश पर्वत लौटेगा, उसे ही तीनों लोकों में ‘प्रथम पूज्य’ की उपाधि से विभूषित किया जाएगा।”
भगवान कार्तिकेय का मयूर पर तीव्र वेग से प्रस्थान
भगवान शिव की इस घोषणा को सुनते ही उनके ज्येष्ठ पुत्र सेनापति कार्तिकेय (स्कंद) तुरंत अपने अत्यंत द्रुतगामी वाहन मयूर (मोर) पर सवार हो गए। उन्होंने बिना एक पल भी गंवाए बिजली की गति से संपूर्ण ब्रह्मांड, द्वीपों, पर्वतों और महासागरों की परिक्रमा करने हेतु आकाश में उड़ान भर दी।
अन्य सभी देवता भी अपने-अपने तीव्रगामी वाहनों पर सवार होकर परिक्रमा हेतु दौड़ पड़े। उधर कैलाश पर खड़े छोटे बालक गणेश जी शांत भाव से मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे।

श्री गणेश जी का संकट: मूषक वाहन और विशाल काया
भगवान गणेश जी की शारीरिक काया स्थूल थी, उनका उदर विशाल था और उनका वाहन एक नन्हा मूषक (चूहा) था। भौतिक दृष्टि से देखा जाए तो मूषक की गति मयूर या अन्य देव-वाहनों की गति के सामने अत्यंत धीमी थी। मूषक पर बैठकर संपूर्ण ब्रह्मांड की तीन बार परिक्रमा करना वर्षों का कार्य प्रतीत होता था।
कैलाश पर उपस्थित अनेक गण और देवता मन ही मन सोचने लगे कि अब गणेश जी इस प्रतियोगिता में कभी विजयी नहीं हो सकते। किंतु जहाँ शारीरिक बल और साधन सीमित हों, वहाँ सनातन धर्म की सर्वोच्च शक्ति काम आती है— विवेक और धर्म बुद्धि।
माता-पिता के चरणों में तीनों लोक: गणेश जी की अद्भुत प्रदक्षिणा
श्री गणेश जी ने तनिक भी अधीरता नहीं दिखाई। उन्होंने अपने शांत मन से वेदों और शास्त्रों के मूल तत्व का चिंतन किया। शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है:
“माता-पिता प्रत्यक्ष देवता हैं। समस्त तीर्थ, संपूर्ण लोक और ब्रह्मांड की समस्त पावन ऊर्जा माता-पिता के श्रीचरणों में ही नित्य वास करती है।”
यह सोचते ही बालक गणेश जी ने अपने हाथ जोड़े और कैलाश पर रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजित अपने पूज्य पिता भगवान शिव और माता पार्वती के समक्ष पहुंचे। उन्होंने अत्यंत विनम्रतापूर्वक दोनों के चरणों का स्पर्श कर वंदना की।
इसके उपरांत, गणेश जी ने भक्तिभाव से माता-पिता को मध्य में रखकर उनकी सात बार श्रद्धापूर्वक प्रदक्षिणा (परिक्रमा) की। परिक्रमा पूर्ण कर उन्होंने हाथ जोड़कर माता-पिता को साष्टांग प्रणाम किया और शांत भाव से उनके चरणों के समीप बैठ गए।
महादेव का विस्मय और गणेश जी का उत्तर
भगवान शिव ने आश्चर्यचकित होकर पूछा— “पुत्र गणेश! तुम्हारे भ्राता कार्तिकेय और अन्य देवगण तो ब्रह्मांड की परिक्रमा करने तीव्र गति से गए हैं। तुम अभी तक यहीं क्यों बैठे हो? तुमने ब्रह्मांड की परिक्रमा क्यों नहीं की?”
इस पर बुद्धि के सागर श्री गणेश जी ने हाथ जोड़कर अत्यंत मधुर वाणी में उत्तर दिया:
“हे परमपिता! हे जगदम्बा माँ! वेदों और सनातन धर्म की आज्ञा है कि माता में समस्त पृथ्वी समाई है और पिता में समस्त आकाश व देवलोक स्थित हैं। जो संतान श्रद्धापूर्वक अपने माता-पिता के चरणों की परिक्रमा कर लेती है, उसकी संपूर्ण ब्रह्मांड और समस्त तीर्थों की परिक्रमा स्वतः ही संपन्न हो जाती है। आप दोनों ही मेरे लिए साक्षात ब्रह्मांड हैं। अतः आपकी परिक्रमा करने के पश्चात मुझे किसी अन्य भौतिक ब्रह्मांड में भटकने की कोई आवश्यकता नहीं है।”
महादेव का वरदान और प्रथम पूज्य का पद
बालक गणेश के इस अद्भुत, तार्किक और गूढ़ आध्यात्मिक उत्तर को सुनकर भगवान शिव और माता पार्वती का हृदय वात्सल्य से भर गया। कैलाश पर पुष्पों की वर्षा होने लगी।
भगवान शिव ने अत्यंत प्रसन्न होकर अपने प्रिय पुत्र को हृदय से लगा लिया और समस्त त्रिलोकी के समक्ष घोषणा की:
“पुत्र गणेश! तुमने अपनी अद्वितीय प्रज्ञा, धर्मनिष्ठा और माता-पिता के प्रति सर्वोच्च भक्ति से यह सिद्ध कर दिया है कि विवेक ही संसार की सबसे बड़ी शक्ति है। आज से तीनों लोकों में किसी भी पूजा, यज्ञ, व्रत, विवाह अथवा पावन कार्य के आरंभ में सबसे पहले तुम्हारी पूजा की जाएगी। जो व्यक्ति तुम्हारी पूजा किए बिना कोई कार्य करेगा, उसका वह कार्य कभी सिद्ध नहीं होगा। तुम ‘विघ्नहर्ता’ और ‘प्रथम पूज्य’ कहलाओगे!”
कार्तिकेय जी का आगमन और धर्म का बोध
कुछ समय उपरांत जब भगवान कार्तिकेय तीनों लोकों की परिक्रमा करके पसीने से लथपथ होकर कैलाश लौटे, तो उन्होंने देखा कि गणेश जी पहले से ही भगवान शिव के चरणों में बैठे मोदक का आनंद ले रहे हैं और देवगण उनकी वंदना कर रहे हैं।
जब कार्तिकेय जी को गणेश जी की युक्ति और माता-पिता के प्रति उनकी अलौकिक भक्ति का पता चला, तो उनका सारा अभिमान समाप्त हो गया। उन्होंने सहर्ष अपने छोटे भाई गणेश के मस्तक को चूमा और उनके प्रथम पूज्य पद को स्वीकार किया।
कथा का सनातन संदेश: संतानों के लिए आदर्श शिक्षा
श्री गणेश जी की यह पावन कथा हर युग की संतानों को यह संदेश देती है:
- माता-पिता से बड़ा कोई तीर्थ नहीं: चार धाम, नदियां और मंदिर पूजनीय हैं, किंतु जो संतान अपने जीवित माता-पिता की सेवा और आदर नहीं करती, उसकी कोई भी पूजा सार्थक नहीं होती।
- शारीरिक बल से श्रेष्ठ विवेक: जीवन की दौड़ों में केवल तेज भागना आवश्यक नहीं है; सही दिशा, समझ और विवेक से बड़ी से बड़ी बाधा को सरलता से पार किया जा सकता है।
- विघ्नों का नाश: जो व्यक्ति अपने कार्यों में बड़ों का आशीर्वाद और गणेश जी का स्मरण रखता है, उसके जीवन के समस्त विघ्न स्वतः समाप्त हो जाते हैं।
निष्कर्ष एवं पावन स्तुति
श्री गणेश जी का यह चरित्र हमें सिखाता है कि श्रद्धा, विनय और कर्तव्यपरायणता ही ईश्वर की सच्ची पूजा है।
हे विघ्नविनाशक, बुद्धिदाता, माता पार्वती और पिता शिव के नंदन श्री गणेश! हमारे जीवन से अहंकार और अज्ञान को दूर कर हमें सद्बुद्धि, माता-पिता की सेवा का भाव और कल्याणकारी मार्ग प्रदान करें। ॐ गं गणपतये नमः! जय श्री गणेश!