संत एवं ऋषि
महर्षि वाल्मीकि — आदिकवि, रामायण के रचनाकार एवं अनुष्टुप छंद का प्राकट्य
क्रौंच पक्षी के विलाप से उपजा प्रथम श्लोक — जिन्होंने प्रभु श्रीराम का अमर चरित्र रचा
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महर्षि वाल्मीकि — आदिकवि, रामायण के रचनाकार एवं अनुष्टुप छंद का प्राकट्य
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्॥
यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्॥
संसार का प्रथम श्लोक: हे बहेलिये! तूने काममोहित क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक का वध किया है, इसलिए तुझे कभी शांति और प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं होगी। यह शोक ही श्लोक बन गया।
📜 आदिकवि का पावन जीवन प्रसंग
तमसा नदी के पावन तट पर जब महर्षि वाल्मीकि ने एक व्याध (बहेलिए) द्वारा क्रौंच पक्षी के वध को देखा, तो उनके हृदय से करुणा का ऐसा ज्वार उमड़ा कि उनके मुख से संसार का प्रथम अनुष्टुप छंद का श्लोक फूट पड़ा। तभी साक्षात ब्रह्मा जी ने प्रकट होकर कहा: “हे ऋषिवर! यह छंद मेरी ही प्रेरणा से आपके मुख से निकला है। इसी छंद में आप मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के पावन चरित्र (रामायण) की रचना करें।”
🌟 माता सीता को आश्रय और लव-कुश को शिक्षा
महर्षि वाल्मीकि ने अपने आश्रम में निष्कासित माता सीता को अपनी पुत्री के समान संरक्षण दिया। उन्होंने लव और कुश को वेद, धनुर्विद्या और संपूर्ण रामायण का गायन सिखाया। वाल्मीकि रामायण आज भी समस्त विश्व साहित्य का आदि स्तंभ और मर्यादा का अमर संविधान है।