महामृत्युंजय मंत्र एवं गायत्री मंत्र — शुद्ध संस्कृत, भावार्थ व जप विधि

वैदिक महामंत्र

सनातन धर्म के दो परम शक्तिशाली महामंत्र

वेदों में गायत्री मंत्र को ‘मंत्रों की माता’ और महामृत्युंजय मंत्र को ‘मोक्ष और आरोग्य प्रदाता’ सर्वोच्च मंत्र कहा गया है।

१. महामृत्युंजय मंत्र (ऋग्वेद ७.५९.१२)

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृ त्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

सरल भावार्थ: हम त्रिनेत्रधारी (भूत, वर्तमान, भविष्य के ज्ञाता) परमशिव की पूजा करते हैं, जो समस्त संसार को सुवासित (सुगन्धित) करते हैं और सबका पोषण करते हैं। जैसे पका हुआ ककड़ी अपनी बेल के बंधन से स्वतः मुक्त हो जाता है, उसी प्रकार हम मृत्यु व संसार के बंधनों से मुक्त होकर अमरता (मोक्ष) को प्राप्त हों, मृत्यु से भयभीत न हों।

ऋषि: वशिष्ठ
देवता: रुद्र/शिव
छंद: अनुष्टुप
माला: रुद्राक्ष (१०८ मनके)

२. महामंत्र गायत्री (ऋग्वेद ३.६२.१०)

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥

सरल भावार्थ: उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अपनी अंतरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करे।

ऋषि: विश्वामित्र
देवता: सविता (सूर्य)
छंद: निचृद् गायत्री
समय: ब्राह्ममुहूर्त / त्रिकाल संध्या

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