हिंदू त्योहार
श्री कृष्ण जन्माष्टमी — उत्सव, रोहिणी नक्षत्र पूजन, व्रत नियम एवं महत्व
भगवान श्री कृष्ण का मध्यरात्रि प्राकट्य — धर्म की स्थापना और आनंद की वर्षा
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श्री कृष्ण जन्माष्टमी — उत्सव, रोहिणी नक्षत्र पूजन, व्रत नियम एवं महत्व
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
गीता वचन: जब-जब धर्म की हानि और अधर्म का उत्थान होता है, तब-तब सज्जनों की रक्षा, दुष्टों के संहार और धर्म की स्थापना के लिए मैं प्रकट होता हूं।
🌙 भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की पावन रात्रि
मथुरा के कारागार में वासुदेव और देवकी के आठवें पुत्र के रूप में रोहिणी नक्षत्र की घनघोर मध्यरात्रि में भगवान श्री कृष्ण का अवतरण हुआ। उनके जन्म लेते ही कारागार के बंधन टूट गए, पहरेदार निद्रालीन हो गए और यमुना जी ने प्रभु के चरण छूकर अपना मार्ग प्रशस्त किया।
🪔 पूजन क्रम एवं व्रत पारण
दिनभर निर्जल अथवा फलाहार व्रत रखकर रात्रि 12:00 बजे खीरे को काटकर भगवान के जन्म का संस्कार (नाल छेदन) किया जाता है। लड्डू गोपाल का पंचामृत अभिषेक कर, झूला झुलाया जाता है और धनिया की पंजीरी, माखन-मिश्री तथा चरणामृत का भोग लगाकर व्रत खोला जाता है।