हिंदू संस्कृति एवं परंपरा
तिलक लगाने की परंपरा — आज्ञा चक्र, वैज्ञानिक कारण एवं धार्मिक महत्व
मस्तक के मध्य त्रिपुण्ड और ऊर्ध्वपुण्ड्र — चेतना, शीतलता और तेज का प्रतीक
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तिलक लगाने की परंपरा — आज्ञा चक्र, वैज्ञानिक कारण एवं धार्मिक महत्व
केशवं क्लेशहरणं सर्वकल्याणकारकम्।
ध्यात्वा करोमि तिलकं ललाटे मंगलप्रदम्॥
ध्यात्वा करोमि तिलकं ललाटे मंगलप्रदम्॥
तिलक धारण मंत्र: समस्त क्लेशों को हरने वाले और सर्व कल्याणकारी भगवान का ध्यान करते हुए मैं अपने ललाट पर इस मंगलकारी पावन तिलक को धारण करता हूं।
🧠 आज्ञा चक्र और वैज्ञानिक कारण
दोनों भौहों के ठीक मध्य में शरीर का छठा ऊर्जा केंद्र ‘आज्ञा चक्र’ (तृतीय नेत्र) और पीनियल ग्रंथि (Pineal Gland) स्थित है।
- शीतलता एवं एकाग्रता: चंदन का तिलक लगाने से मस्तक शीतल रहता है, सिरदर्द और तनाव से मुक्ति मिलती है और ध्यान गहरा होता है।
- ऊर्जा का संरक्षण: कुमकुम और रोली में हल्दी और चूने का वैज्ञानिक मिश्रण होता है जो चेहरे की तंत्रिकाओं में रक्त संचार को सुचारु रखता है।
- सकारात्मक विचार: अनामिका अंगुली से तिलक लगाने से शांति और अंगूठे से तिलक लगाने से पुष्टि और ओज की वृद्धि होती है।
🕉️ तिलक के प्रमुख संप्रदाय भेद
सनातन धर्म में दो मुख्य तिलक परंपराएं हैं: १. ऊर्ध्वपुण्ड्र (वैष्णव परंपरा में भगवान विष्णु के चरण और तुलसी दल का प्रतीक, जो नीचे से ऊपर की ओर उर्ध्वगामी चेतना दर्शाता है), और २. त्रिपुण्ड्र (शैव परंपरा में भस्म या चंदन की तीन आड़ी रेखाएं, जो त्रिगुण और शिव के त्रिशूल का प्रतीक हैं)।