हिंदू संस्कृति एवं परंपरा
स्वस्तिक का हिंदू परंपरा में महत्व और रहस्य — कल्याण और मंगल का पावन प्रतीक
सु + अस्ति अर्थात् शुभ और मंगल — सनातन धर्म का सर्वमंगलकारी वैदिक चिन्ह
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स्वस्तिक का हिंदू परंपरा में महत्व और रहस्य — कल्याण और मंगल का पावन प्रतीक
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
स्वस्ति वाचन मंत्र: महान कीर्ति वाले इंद्र हमारा कल्याण करें, सर्वज्ञ पूषा देव हमारा मंगल करें, गरुड़ देव हमारी रक्षा करें और बृहस्पति देव हमें सौभाग्य प्रदान करें।
卐 स्वस्तिक की चार भुजाओं का दार्शनिक अर्थ
स्वस्तिक की चार भुजाएं और उनके मध्य की चार बिंदियां संपूर्ण ब्रह्मांडीय संतुलन को दर्शाती हैं:
- चार दिशाएं: पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण से आने वाली सकारात्मक ऊर्जा।
- चार वेद: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद का ज्ञान।
- चार पुरुषार्थ: धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का समन्वय।
- चार आश्रम: ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास।
- चार युग: सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, कलियुग का कालचक्र।
🪔 द्वार और पूजन में स्वस्तिक निर्माण
गृह के मुख्य द्वार, तिजोरी, बहीखातों और पूजा स्थल पर रोली व हल्दी से स्वस्तिक बनाने से नकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश रुकता है और घर में सुख, शांति तथा लक्ष्मी का स्थाई वास होता है।