
ॐ आदित्याय विद्महे मार्तण्डाय धीमहि तन्नः सूर्यः प्रचोदयात्॥
षष्ठांशां प्रकृतेः शुद्धां सुप्रतिष्ठां च सुप्रभाम्। वरदां शुभदां देवीमिष्टदेवीं भजाम्यहम्॥
भावार्थ: हम भुवनभास्कर भगवान सूर्य का ध्यान करते हैं, जो समस्त जगत को प्रकाश और नवजीवन प्रदान करते हैं। साथ ही मूल प्रकृति के छठे पावन अंश से प्रकट हुईं भगवती षष्ठी देवी (छठी मैया) की वंदना करते हैं, जो समस्त संतानों की रक्षिका, सुख-समृद्धि और आरोग्य दायिनी हैं।
विषय सूची (Table of Contents)
- 1. छठ पूजा क्या है?
- 2. छठ पर्व का धार्मिक महत्व
- 3. सूर्य देव और छठी मैया की उपासना
- 4. छठ पूजा से जुड़ी प्रमुख मान्यताएं और कथाएं
- 5. छठ पूजा कब मनाई जाती है
- 6. चार दिनों का पूरा विवरण
- 7. पहला दिन — नहाय-खाय
- 8. नहाय-खाय की पूजा और भोजन परंपरा
- 9. दूसरा दिन — खरना
- 10. खरना की पूजा
- 11. खरना का प्रसाद
- 12. तीसरा दिन — संध्या अर्घ्य
- 13. संध्या अर्घ्य की संपूर्ण विधि
- 14. चौथा दिन — उषा अर्घ्य
- 15. प्रातःकालीन अर्घ्य की विधि
- 16. पारण
- 17. पूजा सामग्री की complete checklist
- 18. ठेकुआ प्रसाद
- 19. कसार और अन्य प्रसाद
- 20. सूप और डाला का महत्व
- 21. घाट की तैयारी
- 22. छठ व्रत के प्रमुख नियम
- 23. स्वच्छता और सात्त्विकता की परंपरा
- 24. व्रत में क्या करें और क्या न करें
- 25. छठ पूजा के लोकगीतों और सामुदायिक परंपरा का परिचय
- 26. बिहार की परंपराएं
- 27. पूर्वी उत्तर प्रदेश की परंपराएं
- 28. झारखंड की परंपराएं
- 29. भारत के अन्य क्षेत्रों में छठ पूजा
- 30. पर्यावरण और स्वच्छता का महत्व
- 31. घर पर छठ पूजा करने की सामान्य जानकारी
- 32. FAQ — कम से कम 10
- 33. निष्कर्ष
1. छठ पूजा क्या है?
सनातन हिंदू धर्म और भारतीय लोक संस्कृति में छठ पूजा (Chhath Puja) केवल एक व्रत या उत्सव नहीं, अपितु लोक आस्था का वह महासंगम है जहाँ अध्यात्म, प्रकृति वंदना, सामाजिक समरसता और कठोर तपस्या एक बिंदु पर आकर एकाकार हो जाते हैं। इसे सूर्य षष्ठी, छठ पर्व, डाला छठ और महापर्व के नामों से भी संबोधित किया जाता है।
यह संपूर्ण भारतवर्ष, विशेषकर बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल) और नेपाल के तराई क्षेत्रों में अत्यंत श्रद्धा, शुचिता और पवित्रता के साथ मनाया जाने वाला चार दिवसीय महापर्व है। इस व्रत में प्रत्यक्ष देव भुवनभास्कर भगवान सूर्य और उनकी बहन एवं बालकों की अधिष्ठात्री देवी षष्ठी माता (जिन्हें लोकभाषा में छठी मैया कहा जाता है) की सम्मिलित आराधना की जाती है।
छठ व्रत को भारतीय सनातन परंपरा का सबसे कठिन और नियमबद्ध व्रत माना गया है। इसमें व्रती लगभग 36 घंटों तक निर्जला (बिना अन्न और जल के) उपवास रखते हैं, शीतल जल में घंटों खड़े होकर अस्ताचलगामी (डूबते) और उदीयमान (उगते) सूर्य को अर्घ्य समर्पित करते हैं। इस महापर्व की सबसे अनुपम विशेषता यह है कि इसमें किसी पुरोहित या मध्यस्थ की अनिवार्यता नहीं होती; प्रत्येक भक्त सीधे प्रकृति, जल और सूर्य के सम्मुख उपस्थित होकर अपनी आराधना अर्पित करता है।
2. छठ पर्व का धार्मिक महत्व
छठ पर्व का दार्शनिक आधार वेदों और उपनिषदों की उस दृष्टि में निहित है जो समस्त ब्रह्मांड को एक चैतन्य सत्ता मानती है। भारतीय सनातन दर्शन में भगवान सूर्य एकमात्र ऐसे देवता हैं जो प्रतिदिन मानव नेत्रों को साक्षात दर्शन देते हैं (प्रत्यक्षो देवता सूर्यः)।
धार्मिक एवं आध्यात्मिक दृष्टिकोण से छठ महापर्व के प्रमुख आयाम निम्नलिखित हैं:
- प्रत्यक्ष देव की कृतज्ञता वंदना: सूर्य देव समस्त चराचर जगत की आत्मा, ऊर्जा के मूल स्रोत और जीवन के संचालक हैं। ऋग्वेद में कहा गया है—‘सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च’ (सूर्य समस्त स्थावर और जंगम जगत की आत्मा हैं)। छठ पूजा के माध्यम से साधक पृथ्वी पर जीवन, फसलों की उर्वरता और प्रकाश प्रदान करने के लिए सूर्य देव के प्रति अपनी अनन्य कृतज्ञता व्यक्त करता है।
- पंचतत्वों का दिव्य सामंजस्य: यह व्रत क्षिति, जल, पावक, गगन और समीर—इन पंचतत्वों के प्रति मनुष्य के समर्पण का प्रतीक है। व्रती मिट्टी की वेदी बनाता है, पवित्र नदी के जल में खड़ा होता है, सूर्य के तेज और वायु के स्पर्श को आत्मसात करता है।
- आरोग्य एवं तेजस्विता की प्राप्ति: सूर्य देव को आयुर्वेद और ज्योतिष में आरोग्य का कारक (आरोग्यं भास्करादिच्छेत्) माना गया है। कार्तिक मास के संधि काल में सूर्य की पराबैंगनी और अवरक्त किरणों का संतुलन मानव शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता और जीवनी शक्ति को कई गुना बढ़ा देता है।
- जातिगत बंधनों से परे सामाजिक समरसता: छठ पूजा सामाजिक समानता का अद्वितीय उदाहरण है। जिस बांस के सूप और दउरा में महाप्रसाद सजाया जाता है, उसे समाज का वंचित बांस शिल्पी वर्ग तैयार करता है; मिट्टी के चूल्हे और दीये कुम्हार बनाते हैं; और खेत की नई फसल किसान लाते हैं। घाट पर राजा और रंक, धनी और निर्धन एक साथ एक ही जलधारा में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होते हैं।
3. सूर्य देव और छठी मैया की उपासना
जनमानस में प्रायः यह जिज्ञासा रहती है कि सूर्य षष्ठी पर सूर्य देव के साथ छठी मैया का क्या संबंध है। वैदिक और पौराणिक वांग्मय के अनुसार, दोनों की उपासना वस्तुतः पुरुष और प्रकृति की समन्वित शक्ति की आराधना है।
छठी मैया कौन हैं?
श्रीमद्देवीभागवत पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खंड के अनुसार, जब सृष्टि की रचना हो रही थी, तब मूल प्रकृति के षष्ठ (छठे) अंश से एक तेजस्विनी देवी प्रकट हुईं। संस्कृत में इन्हें षष्ठी देवी और देवसेना कहा गया है, जो देवों के सेनापति भगवान कार्तिकेय की पत्नी तथा ब्रह्मदेव की मानस पुत्री मानी जाती हैं:
“षष्ठांशां प्रकृतेर्या च सा च षष्ठी प्रकीर्तिता। बालकानां च धात्री या संरक्षिका सदा॥”
अर्थात् मूल प्रकृति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण वे ‘षष्ठी’ कहलाती हैं। वे नवजात शिशुओं की रक्षा करने वाली, निसंतान दंपतियों को संतान प्रदान करने वाली और परिवार के बालकों को दीर्घायु एवं आरोग्य देने वाली ममतामयी जगन्माता हैं। लोक परंपरा में सूर्य देव और षष्ठी देवी को भाई-बहन के रूप में भी आत्मीय भाव से देखा जाता है। अतः सूर्य देव की उपासना से जहाँ आत्मा को तेज मिलता है, वहीं छठी मैया की कृपा से संतान सुख और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
4. छठ पूजा से जुड़ी प्रमुख मान्यताएं और कथाएं
छठ पर्व से संबंधित कई पावन आख्यान हिंदू ग्रंथों और लोकगाथाओं में मिलते हैं। यहाँ लिखित शास्त्रीय परंपराओं और क्षेत्रीय लोक मान्यताओं का स्पष्ट समन्वय देखा जा सकता है:
(क) राजा प्रियंवद और मालिनी की शास्त्रीय कथा
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, स्वायम्भुव मनु के पुत्र राजा प्रियंवद बड़े धर्मात्मा थे, परंतु वे दीर्घकाल तक निसंतान रहे। महर्षि कश्यप ने पुत्र प्राप्ति के लिए ‘पुत्रेष्टि यज्ञ’ संपन्न कराया और महारानी मालिनी को यज्ञ का आहुति रूपी पायस (खीर) प्रसाद दिया। इसके प्रभाव से महारानी गर्भवती हुईं, किंतु दुर्भाग्यवश गर्भ से मृत बालक उत्पन्न हुआ। राजा प्रियंवद मृत शिशु को लेकर श्मशान पहुंचे और वियोग में अपने प्राण त्यागने को तत्पर हो गए।
उसी क्षण आकाश में एक दिव्य ज्योतिर्मय विमान उतरा, जिसमें भगवती षष्ठी देवी विराजमान थीं। देवी ने कहा, “हे राजन! मैं ब्रह्मा की मानस पुत्री देवसेना हूँ। संसार में बालकों के जन्म, रक्षण और पोषण की शक्ति मेरे अधीन है। तुम मेरा विधिपूर्वक पूजन करो और जन-जन में मेरी महिमा का प्रचार करो।” देवी ने उस मृत बालक का स्पर्श किया, और वह बालक पुनः जीवित होकर किलकारियां मारने लगा। राजा ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी को देवी षष्ठी का महापूजन किया, जिसके बाद यह व्रत लोक में प्रसिद्ध हुआ।
(ख) महाभारत कालीन संदर्भ: द्रौपदी और पांडवों की सूर्योपासना
महाभारत के वनपर्व में उल्लेख मिलता है कि जब पांडव द्यूत क्रीड़ा में अपना सर्वस्व हारकर बारह वर्ष के वनवास में थे, तब हजारों ब्राह्मण और ऋषि उनके आश्रम में आते थे। भोजन की व्यवस्था न होने से युधिष्ठिर अत्यंत चिंतित हुए। तब महर्षि धौम्य के उपदेश से धर्मराज युधिष्ठिर और द्रौपदी ने प्रत्यक्ष देव भगवान सूर्य की अनन्य उपासना की। भगवान सूर्य ने प्रसन्न होकर द्रौपदी को एक दिव्य अक्षय पात्र प्रदान किया, जिससे जब तक द्रौपदी स्वयं भोजन न कर लें, तब तक भोजन कभी समाप्त नहीं होता था। आगे चलकर द्रौपदी द्वारा सूर्य षष्ठी का नियमपूर्वक व्रत करने से पांडवों को उनका खोया हुआ राज्य और यश पुनः प्राप्त हुआ।
(ग) दानवीर कर्ण द्वारा सूर्य को अर्घ्य अर्पण
महाभारत काल में अंगदेश (आधुनिक भागलपुर, मुंगेर व बिहार का सीमावर्ती क्षेत्र) के राजा दानवीर कर्ण प्रतिदिन प्रातःकाल गंगा नदी के जल में कमर तक खड़े होकर भगवान सूर्य की उपासना करते थे और अर्घ्य अर्पित करते थे। सूर्य देव के आशीर्वाद से ही कर्ण अजय योद्धा और अनुपम दानी बने। आज भी छठ के दिन जल में खड़े होकर अर्घ्य देने की परंपरा इसी प्राचीन सूर्योपासना का जीवंत स्वरूप है।
(घ) माता सीता और भगवान श्रीराम द्वारा सूर्य षष्ठी व्रत (लोक-प्रसंग)
लोक-मान्यताओं और क्षेत्रीय रामायण प्रसंगों के अनुसार, लंका विजय के उपरांत जब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम और माता जानकी अयोध्या लौटे, तो उन्होंने राज्याभिषेक से पूर्व ब्रह्महत्या के दोष-निवारण और रामराज्य की मंगलकामना हेतु कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन सरयू नदी के तट पर सूर्य देव की विशेष पूजा की और व्रत रखा था। मिथिला की बेटी माता सीता द्वारा सूर्य षष्ठी व्रत रखने की यह परंपरा आज भी संपूर्ण मिथिलांचल और पूर्वांचल में मातृ-शक्ति के गौरव का प्रतीक है।
5. छठ पूजा कब मनाई जाती है
हिंदू पंचांग के अनुसार, छठ पूजा का मुख्य अनुष्ठान वर्ष में दो बार किया जाता है:
- कार्तिक छठ (मुख्य महापर्व): यह सबसे बड़ा और व्यापक छठ पर्व है, जो प्रतिवर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से सप्तमी तिथि तक चार दिनों तक मनाया जाता है। अंग्रेजी पंचांग के अनुसार यह तिथि प्रायः अक्टूबर के अंत अथवा नवंबर के प्रारंभ में आती है। जब शरद ऋतु का आगमन होता है और धान की नई फसल घरों में आती है, तब यह महापर्व धूमधाम से मनाया जाता है।
- चैती छठ: यह पर्व चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से सप्तमी तिथि तक (प्रायः मार्च या अप्रैल माह में, चैत्र नवरात्रि के आसपास) मनाया जाता है। इसकी विधि और नियम भी कार्तिक छठ के ही समान कठोर होते हैं।
6. चार दिनों का पूरा विवरण
छठ महापर्व कोई एक दिवसीय पूजा नहीं है, बल्कि यह चार दिनों तक चलने वाला एक क्रमिक साधना क्रम है, जिसमें प्रत्येक दिन का अपना आध्यात्मिक, शारीरिक और मानसिक महत्व है:
| दिवस | तिथि (कार्तिक शुक्ल) | पर्व का नाम | प्रमुख अनुष्ठान एवं गतिविधि | आहार / उपवास की स्थिति |
|---|---|---|---|---|
| पहला दिन | चतुर्थी | नहाय-खाय | पवित्र नदी/सरोवर में स्नान, गृह व रसोई की शुद्धि, पूजा का संकल्प | सेंधा नमक और घी में बना कद्दू-भात (लौकी की सब्जी व अरवा चावल) |
| दूसरा दिन | पंचमी | खरना (लोहंडा) | दिनभर निर्जला उपवास, संध्या समय मिट्टी के चूल्हे पर खीर-रोटी का निर्माण व सूर्य पूजन | गुड़ की रसियाव (खीर) और घी लगी रोटी का एक बार एकांत में सेवन |
| तीसरा दिन | षष्ठी | संध्या अर्घ्य (पहला अर्घ्य) | ठेकुआ प्रसाद निर्माण, घाट गमन, कमर तक जल में खड़े होकर अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य | पूर्ण निर्जला उपवास (अन्न व जल का पूर्ण त्याग) |
| चौथा दिन | सप्तमी | उषा अर्घ्य एवं पारण | भोर में घाट गमन, उदीयमान सूर्य को अर्घ्य अर्पण, हवन, चरण स्पर्श और पारण | अदरक, गुड़, कच्चा दूध और प्रसाद से 36 घंटे के निर्जला व्रत का पारण |
7. पहला दिन — नहाय-खाय
चार दिवसीय महापर्व का शुभारंभ कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को ‘नहाय-खाय’ से होता है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है—’नहाय’ अर्थात् स्नान करके पूर्ण पवित्र होना और ‘खाय’ अर्थात् सात्त्विक भोजन ग्रहण करना।
इस दिन व्रती प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर किसी पवित्र नदी (जैसे गंगा, गंडक, सरयू आदि) अथवा जलाशय में स्नान करते हैं। यदि नदी तट उपलब्ध न हो, तो घर पर ही नहाने के जल में गंगाजल मिलाकर स्नान किया जाता है। स्नान के उपरांत व्रती सूर्य देव को प्रणाम कर चार दिवसीय तप का मानसिक संकल्प लेते हैं। इसके साथ ही घर के प्रत्येक कोने, रसोईघर और बर्तनों की विशेष रूप से जल और गंगाजल से धुलाई कर पूर्ण शुद्धि की जाती है।
8. नहाय-खाय की पूजा और भोजन परंपरा
नहाय-खाय के दिन भोजन बनाने की परंपरा अत्यंत विशिष्ट और वैज्ञानिक है:
- पारंपरिक चूल्हा और बर्तन: भोजन केवल पीतल या कांसे के धुले हुए बर्तनों अथवा मिट्टी के नए बर्तनों में पकाया जाता है। साधारणतया इसके लिए मिट्टी का नया चूल्हा और आम की सूखी लकड़ियों का उपयोग किया जाता है।
- सामग्री की शुचिता: भोजन में केवल अरवा चावल (कच्चा चावल), चने की दाल और कद्दू (लौकी/घिया) की सब्जी बनाई जाती है। इसमें साधारण नमक के स्थान पर केवल शुद्ध सेंधा नमक और छौंक के लिए शुद्ध देसी घी, जीरा व हरी मिर्च का प्रयोग होता है। लहसुन, प्याज या किसी भी तामसिक मसाले का स्पर्श भी पूर्णतः वर्जित होता है।
- कद्दू (लौकी) का वैज्ञानिक महत्व: आयुर्वेद के अनुसार लौकी शीतल प्रकृति की और जल से भरपूर होती है। आगे आने वाले तीन दिनों के कठिन उपवास के लिए शरीर को पर्याप्त जलयुक्त (hydrated) और सुपाच्य पोषक तत्वों से युक्त रखने में कद्दू-भात अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है।
- भोजन का क्रम: सबसे पहले भोजन बनाकर भगवान सूर्य और कुलदेवता को भोग लगाया जाता है। इसके पश्चात व्रती मौन होकर सात्त्विक भाव से भोजन ग्रहण करते हैं। व्रती के भोजन कर लेने के बाद ही परिवार के अन्य सदस्य उसी सात्त्विक भोजन को प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं। नहाय-खाय का भोजन ग्रहण करने के बाद व्रती तामसिक वातावरण से दूर रहकर साधना में लीन हो जाते हैं।
9. दूसरा दिन — खरना
कार्तिक शुक्ल पंचमी को छठ का दूसरा पावन दिवस ‘खरना’ कहलाता है। मिथिला और भोजपुरी अंचल में इसे ‘लोहंडा’ भी कहा जाता है। ‘खरना’ का अर्थ होता है—आंतरिक और बाह्य अशुद्धियों का क्षय करके स्वयं को निर्मल बनाना।
खरना के दिन से ही व्रती का कठोर निर्जला उपवास प्रारंभ हो जाता है। व्रती पूरे दिन अन्न अथवा जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं करते। दिनभर पूजा की तैयारियां चलती हैं—गेहूं को धोकर सुखाना, पूजा के लिए फल-फूल और सूप-दउरा की व्यवस्था करना। पूरे घर में अत्यंत शांत और भक्तिमय वातावरण रहता है।
10. खरना की पूजा
खरना की पूजा संध्याकाल में सूर्यास्त के ठीक बाद संपन्न की जाती है:
- पवित्र रसोई की तैयारी: शाम को सूर्य ढलने से पूर्व व्रती पुनः स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करते हैं। घर के पूजा स्थल अथवा शुद्ध कोने को लीप-पोतकर पवित्र किया जाता है।
- आम की लकड़ी पर नैवेद्य निर्माण: मिट्टी के नए चूल्हे पर आम की पवित्र लकड़ी सुलगाकर पीतल के बर्तन में नए अरवा चावल, शुद्ध गाय का दूध और गन्ने का शुद्ध गुड़ मिलाकर रसियाव (खीर) बनाई जाती है। साथ ही गेहूं के आटे से बिना नमक की घी लगी पतली रोटियां तैयार की जाती हैं।
- षष्ठी देवी और सूर्य को भोग: पूजा स्थल पर केले के साफ पत्ते बिछाए जाते हैं। उन पत्तों पर रसियाव, रोटियां, केले, पान, सुपारी, लौंग, इलायची और तुलसी दल सजाए जाते हैं। गाय के घी का चौमुखी दीपक प्रज्वलित किया जाता है और धूप-लोबान जलाकर भगवान भास्कर तथा छठी मैया का विधिवत ध्यान और पूजन किया जाता है।
11. खरना का प्रसाद
खरना की पूजा के उपरांत व्रती उस महाप्रसाद को अत्यंत एकांत और शांत वातावरण में ग्रहण करते हैं। परंपरा यह है कि जब व्रती खरना का प्रसाद ग्रहण कर रहे हों, तब आसपास किसी प्रकार का कोलाहल, पदचाप या आवाज नहीं होनी चाहिए। यदि कोई अप्रिय ध्वनि सुनाई दे, तो व्रती उसी क्षण भोजन रोक देते हैं।
व्रती के प्रसाद ग्रहण कर लेने के बाद, घर के सभी सदस्य, रिश्तेदार और अड़ोस-पड़ोस के लोग भक्तिभाव से आकर खरना का प्रसाद ग्रहण करते हैं। लोक मान्यता है कि खरना का प्रसाद ग्रहण करने से समस्त पापों का शमन होता है। खरना का भोजन ग्रहण करने के पश्चात से व्रती का लगभग 36 घंटे का अखंड निर्जला महाव्रत प्रारंभ हो जाता है, जो सप्तमी के प्रातःकालीन अर्घ्य के बाद ही समाप्त होता है।

12. तीसरा दिन — संध्या अर्घ्य
कार्तिक शुक्ल षष्ठी छठ महापर्व का सबसे प्रमुख और भव्य दिन होता है। इस दिन अस्ताचलगामी (डूबते हुए) भगवान सूर्य को प्रथम अर्घ्य समर्पित किया जाता है, जिसे ‘संध्या अर्घ्य’ या ‘पहला अर्घ्य’ (सँझिया अरघ) कहते हैं।
डूबते सूर्य को प्रणाम करने का गहरा दर्शन:
सामान्यतः संसार उसी को नमन करता है जो उग रहा हो या उन्नति के शिखर पर हो। परंतु सनातन हिंदू संस्कृति की यह अनुपम उदारता और दार्शनिक गहराई है कि छठ पर्व में सर्वप्रथम अस्ताचलगामी सूर्य की वंदना की जाती है। यह इस शाश्वत सत्य का उद्घोष है कि जीवन में अस्त और उदय एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जो आज अस्त हो रहा है, वही कल नवप्रभात लेकर पुनः उदित होगा। यह ढलती हुई अवस्था, वृद्धजनों और अतीत के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अनुपम सांस्कृतिक संदेश है।
13. संध्या अर्घ्य की संपूर्ण विधि
संध्या अर्घ्य का अनुष्ठान अत्यंत मनोहारी, अनुशासित और भक्तिमय होता है:
- दउरा और सूप की सजावट: दोपहर के समय व्रती और परिवार की महिलाएं नए पीले या लाल वस्त्र पहनकर छठ के पारंपरिक लोकगीत गाते हुए बांस के सूपों में प्रसाद सजाती हैं। प्रत्येक सूप में ठेकुआ, कसार, नारियल, सेब, केला, डाभ नींबू, कच्ची हल्दी, अदरक और गन्ना सजाया जाता है। सूप के ऊपर शुद्ध घी का दीपक रखा जाता है। इन सभी सूपों को बांस के बड़े डाले (दउरा) में सजाया जाता है।
- घाट की ओर प्रस्थान: अपराह्न लगभग 3:30 से 4:00 बजे के मध्य परिवार का पुरुष सदस्य (या व्रती का पुत्र/पति) दउरा को अपने सिर पर धारण कर नंगे पांव नदी घाट की ओर प्रस्थान करता है। व्रती महिलाएं पीछे-पीछे पारंपरिक गीत गाते हुए चलती हैं। कई श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी होने पर घर से घाट तक दंड-प्रणाम (कष्ट-भेंट) करते हुए लेट-लेटकर पहुंचते हैं।
- सिरसोता वेदी पर स्थापना: घाट पर पहुंचकर व्रती परिवार अपने निर्धारित स्थान पर मिट्टी की बनी वेदी (सिरसोता) को धोकर उस पर सिंदूर और अक्षत लगाते हैं तथा गन्ने का मंडप बनाकर दउरा और सूप स्थापित करते हैं।
- जल में प्रवेश: सूर्यास्त से लगभग 45 मिनट पूर्व व्रती पीले वस्त्र धारण कर नदी या तालाब के पवित्र शीतल जल में प्रवेश करते हैं और कमर तक जल में स्थिर खड़े हो जाते हैं।
- अर्घ्य अर्पण: जब पश्चिम दिशा में सूर्य देव लालिमा लिए अस्ताचल की ओर अग्रसर होते हैं, तब व्रती दोनों हाथों से सूप को उठाकर अपनी दृष्टि सूर्य देव की ओर केंद्रित करते हैं। परिवार का कोई सदस्य या व्रती स्वयं तांबे के लोटे या शंख से गाय के कच्चे दूध और गंगाजल की अखंड धार सूप के आगे प्रवाहित करते हुए सूर्य देव को अर्घ्य समर्पित करते हैं। इस समय सूर्य मंत्रों और गायत्री मंत्र का निरंतर उच्चारण किया जाता है।
- दीपदान और आरती: अर्घ्य पूर्ण होने पर सूप के दीपक से नदी में दीपदान किया जाता है, सूर्य देव और छठी मैया की आरती उतारी जाती है, और व्रती जल से बाहर आकर घाट की रज (बालू) को अपने मस्तक पर धारण करते हैं।
14. चौथा दिन — उषा अर्घ्य
कार्तिक शुक्ल सप्तमी की पावन भोर छठ महापर्व का चौथा और अंतिम दिन होता है। इस दिन उदीयमान (उगते हुए) भुवनभास्कर को अर्घ्य दिया जाता है, जिसे ‘उषा अर्घ्य’, ‘बिहनिया अरघ’ या ‘भोरवा अरघ’ कहा जाता है।
यह क्षण अंधकार पर प्रकाश की, अज्ञान पर ज्ञान की और निराशा पर आशा की विजय का पावन उत्सव है। अरुणोदय की स्वर्णिम किरणों के मध्य संपूर्ण नदी तट जय छठी मैया और हर-हर महादेव के जयघोष से गुंजायमान हो उठता है।

15. प्रातःकालीन अर्घ्य की विधि
उषा अर्घ्य की विधि अत्यंत पावन और श्रद्धापूर्ण होती है:
- ब्रह्ममुहूर्त में घाट गमन: व्रती और उनके परिजन रात्रि 3:00 से 4:00 बजे के मध्य ही पुनः नए वस्त्र धारण कर सूप और दउरा लेकर घाट पर पहुंच जाते हैं। घाट पर पुनः दीप जलाए जाते हैं और भजन-कीर्तन चलता है।
- शीतल जल में प्रतीक्षा: सूर्योदय से पूर्व ही व्रती पुनः नदी के शीतल जल में कमर तक जाकर खड़े हो जाते हैं और पूर्व दिशा की ओर मुख करके भगवान भास्कर के उदय की प्रतीक्षा करते हैं।
- अरुणोदय की प्रथम किरण का स्वागत: जैसे ही पूर्व क्षितिज पर सूर्य की प्रथम लालिमा प्रस्फुटित होती है, श्रद्धालु शंखध्वनि और घंटों की गूंज के साथ उनका स्वागत करते हैं। व्रती सूप को दोनों हाथों में थामकर सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करते हैं।
- दूध और जल की धार: परिजन लोटे से गाय के कच्चे दूध और गंगाजल की सतत धार गिराते हैं। सूप में रखे प्रत्येक प्रसाद पर सूर्य की प्रातःकालीन अमृतमयी किरणें पड़ती हैं, जिससे वह महाप्रसाद दिव्य ऊर्जा से अभिमंत्रित हो जाता है।
- परिक्रमा और सुख-शांति प्रार्थना: अर्घ्य अर्पण के उपरांत व्रती जल में ही तीन बार घड़ी की सुई की दिशा में (प्रदक्षिणा) घूमते हैं और परिवार, समाज तथा राष्ट्र के कल्याण की प्रार्थना करते हैं।
16. पारण
उषा अर्घ्य संपन्न होने के बाद चार दिवसीय महापर्व के व्रत के समापन अर्थात् पारण (Paran) की विधि संपन्न होती है:
- वेदी पूजन और हवन: जल से बाहर आकर व्रती घाट पर बनी सिरसोता वेदी पर कपूर, घी और हवन सामग्री से छोटा सा हवन करते हैं तथा छठी मैया को प्रणाम करते हैं।
- चरण स्पर्श और आशीर्वाद: परिवार के सभी छोटे-बड़े सदस्य व्रती के चरणों का स्पर्श कर आशीर्वाद लेते हैं। व्रती महिलाएं परिवार के सदस्यों और सुहागिनों के मस्तक और मांग में नाक से लेकर मांग के अंत तक पीला व नारंगी सिंदूर लगाती हैं, जो अखंड सौभाग्य का प्रतीक है।
- पारण का आहार: लगभग 36 घंटे के कठोर निर्जला उपवास के पश्चात व्रती सबसे पहले थोड़ा सा अदरक का टुकड़ा और गुड़ चबाते हैं। इसके उपरांत गंगाजल, कच्चा दूध और ठेकुआ प्रसाद ग्रहण कर अपना व्रत विधिवत खोलते हैं।
- महाप्रसाद वितरण: घर लौटकर सूप और दउरा का प्रसाद सभी सगे-संबंधियों, पड़ोसियों और आगंतुकों में आदरपूर्वक बांटा जाता है। मान्यता है कि छठ का प्रसाद मांगने पर कभी मना नहीं किया जाता और इसे दोनों हाथों से मस्तक से लगाकर ही ग्रहण किया जाता है।
17. पूजा सामग्री की complete checklist
छठ पूजा में प्रयुक्त होने वाली प्रत्येक सामग्री प्रकृति की गोद से आती है। इस महापर्व की पूर्ण सामग्री की विस्तृत चेकलिस्ट निम्नलिखित सारणी में दी गई है:
| सामग्री वर्ग | मुख्य सामग्री की सूची | धार्मिक एवं प्रतीकात्मक महत्व |
|---|---|---|
| बांस एवं हस्तशिल्प पात्र | बांस के सूप (2 या अधिक), पीतल का सूप (वैकल्पिक), बांस का बड़ा डाला (दउरा/दौरी), ढक्कन सहित | वंश वृद्धि, प्रकृति से जुड़ाव और सामाजिक समरसता का प्रतीक |
| धातु एवं मिट्टी के बर्तन | मिट्टी के दीये (दर्जनों), बड़ा चौमुखी मिट्टी का दीया, तांबे या पीतल का लोटा (अर्घ्य देने हेतु), कलश, थाली | पंचतत्वों की शुद्धि और ज्ञान के प्रकाश का प्राकट्य |
| पारंपरिक महाप्रसाद | ठेकुआ (गुड़ और घी में निर्मित), कसार (चावल के आटे के लड्डू), नए अरवा चावल, गन्ने का शुद्ध गुड़, शुद्ध देसी घी | भूमि की प्रथम नई फसल का भगवान को प्रथम समर्पण |
| मौसमी फल एवं कंद-मूल | पत्ते सहित हरा गन्ना (5 या 7 गांठ वाला), डाभ नींबू (बड़ा चकोतरा नींबू), जटा वाला नारियल, केले का घवद (कांधी), शरीफा (सीताफल), सेब, सिंघाड़ा, सुथनी, शकरकंद (अल्हुआ), कच्ची हल्दी का पौधा, अदरक का पौधा, मूली | ऋतु परिवर्तन के समय पृथ्वी की समस्त वनस्पतियों और औषधियों की वंदना |
| पूजन सामग्री एवं श्रृंगार | पीला व नारंगी सिंदूर, रोली, अक्षत (अखंड चावल), चंदन, पान के पत्ते, साबुत सुपारी, लौंग, इलायची, धूपबत्ती, कपूर, रुई की बत्तियां, लाल/पीला कलावा, आम की सूखी लकड़ियां | वैदिक पूजन के षोडशोपचार और सौभाग्य का संवर्धन |
| दूध एवं पवित्र जल | शुद्ध गाय का कच्चा दूध, पवित्र गंगाजल | अमृत तुल्य अर्घ्य और आत्म-शुद्धि का साधन |
18. ठेकुआ प्रसाद
छठ महापर्व की पहचान उसके अनुपम महाप्रसाद ठेकुआ (Thekua) के बिना अधूरी है। इसे पूर्वांचल और बिहार में ‘खजूर’ या ‘ठोकवा’ भी कहा जाता है। यह केवल एक मिष्ठान्न नहीं, अपितु भक्ति, शुचिता और परंपरा का साक्षात विग्रह है।
ठेकुआ निर्माण की मर्यादा और विधि:
- पवित्र सामग्री: ठेकुआ बनाने के लिए गेहूं को गंगाजल से धोकर धूप में सुखाया जाता है और विशेष रूप से साफ की गई चक्की में पीसा जाता है। इसमें शुद्ध गन्ने का गुड़ (या चीनी), शुद्ध गाय का देसी घी, कटी हुई सूखी गरी (नारियल), सौंफ और हरी इलायची का चूर्ण मिलाया जाता है।
- काठ का सांचा: आटे को सख्त गूंथकर शीशम या सागवान की लकड़ी से बने पारंपरिक नक्काशीदार सांचों पर दबाकर सुंदर आकृतियां (पत्ती, फूल आदि) दी जाती हैं।
- पकाने की शुचिता: ठेकुआ को मिट्टी के नए चूल्हे पर आम की सूखी लकड़ियों की आंच पर शुद्ध देसी घी में मंदी आंच पर तला जाता है। जब तक छठी मैया को भोग न लग जाए, तब तक इसे चखना तो दूर, सूंघना भी महापाप माना जाता है। भोजन बनाते समय व्रती महिलाएं और परिवार जन निरंतर छठ गीत गाते रहते हैं।
19. कसार और अन्य प्रसाद
ठेकुआ के साथ-साथ छठ पूजा में कई अन्य पारंपरिक नैवेद्य भी अर्पित किए जाते हैं:
- कसार के लड्डू: नए अरवा चावल को कूटकर उसके महीन आटे में पिसा हुआ गुड़, थोड़ा सा शुद्ध घी और सौंफ मिलाकर हाथों से दबाकर गोल-गोल लड्डू बनाए जाते हैं। इन्हें ‘कसार’ कहा जाता है। यह नई धान की फसल का भगवान सूर्य को समर्पित पहला नैवेद्य होता है।
- सुथनी और अल्हुआ (शकरकंद): ये दोनों जमीन के भीतर उगने वाले प्राकृतिक कंद हैं, जो सात्त्विकता और पृथ्वी तत्व के गहरे प्रतीक हैं।
- डाभ नींबू: सामान्य नींबू से कई गुना बड़ा, मोटा और सुवासित डाभ नींबू छठ के सूप में अनिवार्य रूप से रखा जाता है। यह रोग नाशक और औषधीय गुणों से भरपूर होता है।
- गन्ना (ईख): जड़ और पत्तों सहित पूरा गन्ना छठ के घाट पर मंडप बनाने और सूप में अर्पित करने के लिए अनिवार्य होता है। यह मिठास, अखंडता और जीवन के रस का परिचायक है।
20. सूप और डाला का महत्व
छठ पूजा में सोने, चांदी या बहुमूल्य धातुओं के बर्तनों के स्थान पर साधारण बांस के सूप और टोकरियों (दउरा) का उपयोग किया जाता है। इसके पीछे अत्यंत गहरा आध्यात्मिक और सामाजिक दर्शन समाहित है:
- प्रकृति की सुलभता और सादगी: बांस प्रकृति का वह अनुपम उपहार है जो जल, वायु और भूमि को शुद्ध रखता है। बांस का सूप किसी मशीनी कारखाने में नहीं, बल्कि स्थानीय शिल्पी के हाथों से निष्ठापूर्वक गढ़ा जाता है।
- अहंकार का विसर्जन: छठ पर्व सिखाता है कि परमात्मा के दरबार में धन का कोई अहंकार नहीं चलता। एक धनवान व्यक्ति भी उसी बांस के सूप में फल सजाता है जिसमें एक साधारण निर्धन व्यक्ति। यह सनातन धर्म की अद्भुत समानता का प्रमाण है।
- सूप का सांकेतिक अर्थ: कबीरदास जी ने कहा था—‘साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय। सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय॥’ सूप अनाज के सार तत्व को अपने भीतर रखता है और व्यर्थ तिनकों को उड़ा देता है। छठ का सूप साधक को संदेश देता है कि वह जीवन में अच्छाई को ग्रहण करे और दुर्गुणों का त्याग कर दे।

21. घाट की तैयारी
छठ महापर्व में नदी, सरोवर अथवा नहर के तटों (घाटों) की तैयारी सामुदायिक सेवा का सबसे उत्कृष्ट उदाहरण है। पर्व से कई दिन पूर्व ही स्थानीय लोग, युवा और स्वयंसेवक मिलकर पूरे मार्ग और घाटों की सफाई करते हैं:
- मार्ग की सफाई: जिस मार्ग से होकर व्रती नंगे पैर घाट तक जाते हैं, उस पूरे मार्ग को धोया जाता है, चूना और गेरू से सजाया जाता है और ऊपर आकर्षक तोरण द्वार लगाए जाते हैं।
- सिरसोता वेदी का निर्माण: घाट पर प्रत्येक परिवार अपनी एक मिट्टी की चौकोर या गोल वेदी बनाता है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘सिरसोता’ कहते हैं। इस वेदी को चिकनी मिट्टी और गंगा की बालू से लीपकर संवारा जाता है।
- गन्ने का मंडप: सिरसोता के चारों कोनों पर पांच या सात गांठ वाले लंबे गन्नों को खड़ा करके ऊपर उनके पत्तों को बांधकर एक सुंदर प्राकृतिक मंडप बनाया जाता है। इस मंडप के नीचे मिट्टी का हाथी (हाथी का प्रतीक) और दीपक स्थापित किए जाते हैं।
- प्रकाश और सुरक्षा: रात्रि में घाटों पर रंग-बिरंगी रोशनी, दीपमालाएं और सुरक्षा के लिए बांस की बल्लियां लगाई जाती हैं ताकि जल में कोई दुर्घटना न हो।
22. छठ व्रत के प्रमुख नियम
छठ व्रत अपनी कठोर आचार संहिता और कड़े नियमों के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। इस व्रत को ‘महापर्व’ और ‘कठिन साधना’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें लेशमात्र भी प्रमाद या भूल स्वीकार्य नहीं होती:
- कठोर ब्रह्मचर्य का पालन: नहाय-खाय से लेकर पारण तक व्रती और परिवार के सदस्यों को पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य होता है।
- भूमि शयन: इन चार दिनों के दौरान व्रती पलंग, गद्दे या खाट पर नहीं सोते। वे फर्श पर चटाई, कंबल या सूती चादर बिछाकर सोते हैं।
- वाणी और क्रोध पर नियंत्रण: व्रत के दिनों में झूठ बोलना, अपशब्द कहना, किसी पर क्रोध करना या कटु वचन बोलना सर्वथा वर्जित है। मन को केवल ईश्वर चिंतन और लोकगीतों में लगाना चाहिए।
- बिना स्नान सामग्री को स्पर्श न करना: पूजा की किसी भी सामग्री, यहाँ तक कि फलों और बर्तनों को भी बिना स्नान किए और बिना शुद्ध धुले वस्त्र पहने स्पर्श नहीं किया जा सकता।
- जूठा न करना: घर के छोटे बच्चों को भी विशेष रूप से समझाया जाता है कि वे पूजा के फल या प्रसाद के निकट न जाएं और न ही किसी फल को जूठा करें। पक्षियों द्वारा चोंच मारे गए फल पूजा में स्वीकार नहीं होते।
23. स्वच्छता और सात्त्विकता की परंपरा
छठ पर्व में स्वच्छता (शुचिता) का स्तर इतना सूक्ष्म और कठोर होता है कि आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान भी इसके नियमों को देखकर विस्मृत रह जाता है:
घर के जिस कमरे में पूजा का सामान रखा जाता है, वहाँ किसी को जूते-चप्पल पहनकर जाने की अनुमति नहीं होती। बर्तनों को कई-कई बार गंगाजल और साफ जल से धोया जाता है। भोजन पकाने वाली लकड़ियों तक को धोकर सुखाया जाता है। प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा तो दूर, हींग और साधारण नमक का भी घर में प्रवेश रोक दिया जाता है। यह बाह्य स्वच्छता वस्तुतः मन की आंतरिक शुद्धि का ही प्रतिबिंब है।
24. व्रत में क्या करें और क्या न करें
व्रतियों और श्रद्धालुओं की सुविधा हेतु मुख्य नियमों की व्यावहारिक तुलना नीचे प्रस्तुत है:
| क्या करें (Do’s) | क्या न करें (Don’ts) |
|---|---|
| नहाय-खाय से पूर्व संपूर्ण घर, रसोई और बर्तनों की गंगाजल से गहन सफाई करें। | घर में किसी भी प्रकार का तामसिक भोजन (लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा) न लाएं। |
| पूजा में केवल बांस के नए सूप, दउरा और मिट्टी के दीयों का प्रयोग करें। | प्लास्टिक, थर्मोकोल या कटे-फटे टूटे बर्तनों का पूजा में कदापि उपयोग न करें। |
| चारों दिन सात्त्विक वस्त्र पहनें और भूमि पर चटाई बिछाकर सोएं। | चारपाई, गद्दे या पलंग पर सोने से परहेज करें। |
| अर्घ्य के समय सूर्य मंत्रों का जप करें और मन को शांत व एकाग्र रखें। | घाट पर किसी से विवाद, वाद-विवाद, झगड़ा या कटु भाषा का प्रयोग न करें। |
| प्रसाद बनाते समय पारंपरिक छठ गीत गाएं और शुद्ध देसी घी का ही प्रयोग करें। | प्रसाद को भोग लगने से पूर्व न तो चखें और न ही किसी को छूने दें। |
| व्रती के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें और दोनों हाथों से प्रसाद ग्रहण करें। | छठ के प्रसाद का कभी अनादर न करें और न ही इसे पैरों के पास रखें। |
25. छठ पूजा के लोकगीतों और सामुदायिक परंपरा का परिचय
छठ महापर्व की आत्मा उसके पारंपरिक लोकगीतों में बसती है। इन गीतों के बिना छठ की कल्पना ही नहीं की जा सकती। जब कार्तिक मास में हवा में हल्की ठंडक घुलती है और गलियों में छठ गीतों की मधुर स्वरलहरियां गूंजती हैं, तो प्रवासी भारतीयों का हृदय भी अपनी मातृभूमि की ओर खिंचा चला आता है।
गीतों की काव्यात्मक व आध्यात्मिक गहराई:
इन गीतों में न तो कोई जटिल संस्कृत छंद हैं और न ही कोई दुरूह दर्शन। ये गीत सीधे एक भक्त और उसकी ममतामयी छठी मैया के बीच का वात्सल्यपूर्ण संवाद हैं:
“कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए…
होई ना बलम जी कहरिया, बहंगी घाटे पहुंचाए…”
इस गीत में एक व्रती महिला अपने पति से आग्रह कर रही है कि बांस की नाजुक बहंगी फलों के भार से लचक रही है, आप कहार बनकर इस पावन बहंगी को गंगा घाट तक पहुंचा दीजिए।
“केरवा जे फरेले घवद से, उहे पर सुगा मेड़राय…
उ जे खबरी जनइबो अदित से, सुगा देले जूठियाए…”
इस गीत में प्रकृति और पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशीलता व्यक्त हुई है कि केले के घवद पर तोता मंडरा रहा है, कहीं वह उसे जूठा न कर दे क्योंकि वह फल तो सूर्य देव को समर्पित होना है। पद्म विभूषण स्व. शारदा सिन्हा जी के अमर स्वरों ने छठ गीतों को विश्व के कोने-कोने में अमर बना दिया है।
26. बिहार की परंपराएं
बिहार छठ महापर्व की उद्गम भूमि है। यहाँ छठ केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रत्येक बिहारी के अस्तित्व, अस्मिता और संस्कृति का मूल आधार है:
- गंगा और कोसी के पावन तट: पटना के दीघा, कलेक्ट्रेट और गांधी घाट से लेकर भागलपुर, मुंगेर, बक्सर और बेगूसराय तक गंगा के विशाल तटों पर लाखों श्रद्धालु एक साथ अर्घ्य अर्पित करते हैं। आकाश से देखने पर पूरा घाट दीपों की स्वर्णिम माला जैसा प्रतीत होता है।
- कोसी भरने की परंपरा: यदि किसी परिवार ने कोई विशेष मन्नत मांगी हो, तो वे ‘कोसी’ भरते हैं। इसमें मिट्टी के दर्जनों दीयों को गन्ने के मंडप के नीचे पिरामिड के आकार में सजाकर रातभर जागरण किया जाता है।
- सामूहिक श्रमदान: गाँव-गाँव में लोग मिलकर बिना किसी सरकारी सहायता के स्वयं सड़कें बनाते हैं, चूने का छिड़काव करते हैं और घाटों का निर्माण करते हैं।
27. पूर्वी उत्तर प्रदेश की परंपराएं
पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल) के वाराणसी, गोरखपुर, देवरिया, बलिया, गाजीपुर, मऊ, आजमगढ़, कुशीनगर और मिर्जापुर में छठ महापर्व अत्यंत उल्लास और भव्यता के साथ मनाया जाता है:
- काशी के अर्धचंद्राकार घाट: मोक्षदायिनी काशी में अस्सी घाट, दशाश्वमेध घाट और पंचगंगा घाट पर गंगा की अविरल धारा में खड़े होकर हजारों श्रद्धालु भगवान भास्कर को अर्घ्य देते हैं। इस दृश्य की दिव्यता अवर्णनीय होती है।
- गोरखपुर और सरयू तट: गोरखपुर के रामगढ़ ताल और अयोध्या के पावन सरयू तट पर पूर्वांचल की समृद्ध लोक परंपरा के अनुसार डाला छठ का भव्य आयोजन होता है।
28. झारखंड की परंपराएं
झारखंड में छठ पूजा प्रकृति और जनजातीय-सदान संस्कृति के अद्भुत मिलन का पर्व है:
- पहाड़ों और नदियों की गोद में आराधना: रांची के बड़ा तालाब (स्वामी विवेकानंद सरोवर), बटन तालाब, स्वर्णरेखा नदी और दामोदर नदी के तटों पर अत्यंत श्रद्धा से पूजा की जाती है।
- सामुदायिक सद्भाव: जमशेदपुर, धनबाद, बोकारो और हजारीबाग जैसे औद्योगिक नगरों में सभी भाषा-भाषी और समुदाय मिलकर छठ व्रतियों की सेवा में तन-मन-धन से जुट जाते हैं।
29. भारत के अन्य क्षेत्रों में छठ पूजा
आज छठ महापर्व केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक वैश्विक पर्व बन चुका है:
- महानगरों में छठ का स्वरूप: देश की राजधानी नई दिल्ली में यमुना घाटों और सैकड़ों कृत्रिम तालाबों पर, मुंबई में जुहू चौपाटी और गिरगांव चौपाटी के समुद्र तट पर, तथा कोलकाता के हुगली तट पर लाखों श्रद्धालु इस महापर्व को मनाते हैं।
- वैश्विक विस्तार: नेपाल के तराई क्षेत्रों (जनकपुर, बीरगंज आदि) में यह राष्ट्रीय पर्व की तरह मनाया जाता है। इसके अतिरिक्त मॉरीशस, त्रिनिदाद और टोबैगो, गयाना, संयुक्त राज्य अमेरिका (न्यू जर्सी, कैलिफ़ोर्निया), ब्रिटेन (लंदन में टेम्स नदी तट), ऑस्ट्रेलिया और कनाडा में प्रवासी भारतीय अपनी जड़ों से जुड़े रहकर बड़ी श्रद्धा के साथ छठ पूजा संपन्न करते हैं।
30. पर्यावरण और स्वच्छता का महत्व
यदि आधुनिक विश्व को पर्यावरण संरक्षण, जलवायु संतुलन और सतत विकास (Sustainable Living) का पाठ सीखना हो, तो छठ महापर्व उसका सबसे जीवंत और प्राचीन मॉडल है:
- शून्य प्लास्टिक और 100% बायोडिग्रेडेबल सामग्री: छठ पूजा में उपयोग होने वाली प्रत्येक वस्तु—बांस का सूप, मिट्टी के दीये, पीतल के पात्र, फल, गन्ना, फूल और पत्तियां—पूरी तरह प्राकृतिक और पर्यावरण के अनुकूल होती हैं। पूजा के बाद कोई भी हानिकारक अपशिष्ट नदी में नहीं छूटता।
- जलस्रोतों की स्वतः सफाई: इस पर्व के बहाने समाज के लोग मिलकर नदियों, तालाबों और कुओं की गहरी सफाई करते हैं। जल को ‘देवता’ मानकर पूजने से जल स्रोतों के संरक्षण की चेतना जागृत होती है।
- सौर ऊर्जा का महत्व: यह पर्व मानव को स्मरण कराता है कि संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) सौर ऊर्जा पर निर्भर है। सूर्य की आराधना वस्तुतः जीवन को बनाए रखने वाली ऊर्जा की वंदना है।
31. घर पर छठ पूजा करने की सामान्य जानकारी
आधुनिक व्यस्त जीवनशैली, महानगरों में प्राकृतिक जलस्रोतों के अभाव अथवा शारीरिक अस्वस्थता की स्थिति में कई श्रद्धालु घर पर ही छठ पूजा संपन्न करते हैं। सनातन शास्त्र भाव और शुचिता को प्रधानता देते हैं:
- छत या आंगन में कृत्रिम कुंड: घर की छत, बालकनी या खुले आंगन को अच्छी तरह धोकर पवित्र करें। वहाँ एक बड़ा साफ प्लास्टिक टब, बच्चों का इन्फ्लेटेबल पूल (Inflatable Pool) अथवा ईंटों से छोटा सा चौकोर कुंड बनाकर उसमें स्वच्छ जल भरें और उसमें थोड़ा सा गंगाजल मिलाएं।
- सिरसोता वेदी और मंडप: टब या कुंड के किनारे शुद्ध मिट्टी से छोटी सी वेदी बनाएं। चार गन्नों को खड़ा करके ऊपर बांधकर मंडप का स्वरूप दें और दीप जलाएं।
- कमर तक जल में खड़े होकर अर्घ्य: व्रती शुद्ध वस्त्र पहनकर उस जल भरे टब या कुंड में खड़े होकर पूर्व या पश्चिम दिशा की ओर मुख करके नियमानुसार अस्ताचलगामी और उदीयमान सूर्य को अर्घ्य दे सकते हैं।
- जल का विसर्जन: पूजा के उपरांत उस पवित्र जल को किसी नाली में न बहाएं, बल्कि उसे घर के गमलों, तुलसी के पौधे या किसी वृक्ष की जड़ में अर्पित कर दें।
32. FAQ — कम से कम 10
प्रश्न 1: क्या छठ पूजा का व्रत पुरुष भी रख सकते हैं?
उत्तर: हाँ, बिल्कुल। यद्यपि लोक परंपरा में यह व्रत अधिकांशतः माताओं और बहनों द्वारा रखा जाता है, परंतु शास्त्रों में लिंग का कोई बंधन नहीं है। बड़ी संख्या में पुरुष भी संतान की कुशलता, परिवार के आरोग्य या आत्म-कल्याण के लिए पूरे नियमों के साथ छठ व्रत रखते हैं और 36 घंटे का निर्जला उपवास करते हैं।
प्रश्न 2: यदि परिवार में किसी का जन्म या मरण (सूतक/पातक) हो जाए, तो छठ पूजा कैसे करें?
उत्तर: यदि परिवार में सूतक (बच्चे का जन्म) या पातक (किसी परिजन की मृत्यु) की अशौच अवधि चल रही हो, तो उस वर्ष परिवार का कोई भी सदस्य स्वयं छठ व्रत नहीं कर सकता और न ही घर में प्रसाद बना सकता है। ऐसी स्थिति में मन्नत का क्रम टूटने से बचाने के लिए किसी अन्य व्रती को पूजा सामग्री व सूप भेंट करके अपने नाम से अर्घ्य दिलवाया जा सकता है।
प्रश्न 3: क्या एक बार छठ व्रत प्रारंभ करने के बाद इसे छोड़ा जा सकता है?
उत्तर: परंपरा के अनुसार छठ व्रत एक बार शुरू करने के बाद आजीवन प्रतिवर्ष किया जाता है। जब तक व्रती का शरीर स्वस्थ और सक्षम है, तब तक इसे छोड़ा नहीं जाता। जब व्रती वृद्ध या अत्यधिक अस्वस्थ हो जाएं, तो वे अपने परिवार की अगली पीढ़ी (पुत्रवधू, पुत्री आदि) को विधिपूर्वक यह पावन सूप सौंपकर व्रत की परंपरा को आगे बढ़ा देते हैं।
प्रश्न 4: खरना के बाद क्या जल पी सकते हैं?
उत्तर: नहीं। पंचमी की संध्या को खरना का प्रसाद (खीर-रोटी) ग्रहण करने और जल पीने के बाद से ही व्रती का अखंड निर्जला उपवास प्रारंभ हो जाता है। इसके बाद षष्ठी की पूरी रात, षष्ठी का पूरा दिन, और सप्तमी की प्रातःकालीन अर्घ्य संपन्न होने तक (लगभग 36 घंटे) जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं की जाती।
प्रश्न 5: क्या छठ पूजा में पीतल के सूप का प्रयोग किया जा सकता है?
उत्तर: यद्यपि पारंपरिक रूप से बांस के सूप को ही सर्वोत्तम और अनिवार्य माना गया है, परंतु कुछ क्षेत्रों में सुविधा या पारिवारिक परंपरा के अनुसार पीतल के सूप का भी उपयोग किया जाता है। तथापि, पीतल के सूप के साथ भी कम से कम एक बांस का सूप रखना अत्यंत शुभ और पारंपरिक माना जाता है।
प्रश्न 6: क्या पहली बार छठ व्रत किसी भी वर्ष शुरू किया जा सकता है?
उत्तर: पहली बार छठ व्रत प्रारंभ करने से पूर्व किसी योग्य ज्योतिषाचार्य या कुल पुरोहित से सलाह लेनी चाहिए कि उस वर्ष परिवार में गुरु या शुक्र का तारा अस्त तो नहीं है अथवा कोई मलमास (अधिकमास) तो नहीं है। शुभ मुहूर्त और पंचांग शुद्धि देखकर ही पहली बार व्रत का संकल्प उठाया जाता है।
प्रश्न 7: छठ के दिन व्रती महिलाएं नाक से लेकर मांग तक पीला सिंदूर क्यों लगाती हैं?
उत्तर: छठ पर्व पर व्रती महिलाएं नाक के सिरे से प्रारंभ करके सिर के मध्य मांग तक लंबा पीला या नारंगी सिंदूर लगाती हैं। मान्यता है कि सिंदूर जितना लंबा और स्पष्ट होता है, पति की आयु उतनी ही लंबी होती है और दांपत्य जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है। पीला सिंदूर भगवान सूर्य के तेज और बृहस्पति के शुभ प्रभाव का प्रतीक है।
प्रश्न 8: कोसी भरने का क्या अर्थ है और यह कब भरी जाती है?
उत्तर: जब कोई भक्त किसी असाध्य रोग से मुक्ति, संतान प्राप्ति या बड़ी विपत्ति टलने पर विशेष मन्नत मांगता है, तो वह ‘कोसी’ भरता है। षष्ठी की संध्या अर्घ्य के बाद घर के आंगन में मिट्टी के हाथी और गन्नों का मंडप बनाकर 24 या 36 मिट्टी के दीयों को प्रज्वलित किया जाता है और रातभर भजन गाए जाते हैं। अगली सुबह उस कोसी को घाट पर ले जाकर उषा अर्घ्य के समय पुनः भरा जाता है।
प्रश्न 9: क्या गर्भवती या गंभीर रूप से बीमार महिलाएं यह व्रत रख सकती हैं?
उत्तर: नहीं। छठ का व्रत 36 घंटे का कठोर निर्जला उपवास होता है। गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली माताओं या गंभीर बीमारियों (जैसे मधुमेह, हृदय रोग, गुर्दे की बीमारी) से पीड़ित व्यक्तियों को चिकित्सकीय दृष्टि से निर्जला उपवास नहीं करना चाहिए। वे स्वयं उपवास न रखकर पूजा की तैयारी, सामग्री अर्पण और दर्शन करके भी पूर्ण पुण्य फल प्राप्त कर सकते हैं।
प्रश्न 10: अर्घ्य देते समय दूध और जल की धार का क्या महत्व है?
उत्तर: अर्घ्य देते समय तांबे या पीतल के लोटे से गाय के कच्चे दूध और जल की सतत धार गिराई जाती है। सूर्य की प्रातःकालीन और सायंकालीन किरणें जब इस गिरती हुई जलधारा और दूध के कणों से होकर गुजरती हैं, तो प्रकाश का स्पेक्ट्रम (वर्णक्रम) बनता है। यह दृश्य न केवल आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करता है, बल्कि साधक के नेत्रों और तंत्रिका तंत्र को शीतलता व दिव्य शांति प्रदान करता है।
33. निष्कर्ष
छठ महापर्व सनातन हिंदू धर्म की उस उदात्त चेतना का जीवंत प्रतीक है जो मनुष्य को सीधे प्रकृति, पंचतत्वों और समूची सृष्टि से जोड़ती है। यह पर्व सिखाता है कि जीवन में त्याग, तपस्या और शुचिता का क्या महत्व है।
चार दिनों की यह पावन साधना मनुष्य को अहंकार से शून्य करके समर्पण की पराकाष्ठा तक ले जाती है। जिस पर्व में डूबते और उगते—दोनों सूर्यों को एक समान श्रद्धा से नमन किया जाए, जिस पर्व में जाति, वर्ण और वर्ग के समस्त भेद मिटकर नदी के एक ही घाट पर एकाकार हो जाएं, और जिस पर्व में प्रकृति का एक भी कण प्रदूषित न हो—वह पर्व वस्तुतः संपूर्ण मानवता के लिए एक अमर प्रेरणा है।
छठी मैया और प्रत्यक्ष देव भगवान सूर्य की असीम अनुकंपा आप सभी पर सदैव बनी रहे। आपके परिवार में सुख, शांति, समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य का वास हो।
॥ बोलिए प्रत्यक्ष देव भगवान सूर्य नारायण की जय — जय छठी मैया ॥