🚩 पावन शिव स्तोत्र संग्रह • देवाधिदेव महादेव स्तुति
ॐ नमः शिवाय
॥ अथ श्री शिवाष्टकम् सम्पूर्णम् ॥
महर्षि वेदव्यास रचित ‘श्री शिवाष्टकम्’ (Shri Shivashatakam) भगवान देवाधिदेव महादेव की स्तुति का एक अत्यंत तेजस्वी एवं दुर्लभ स्तोत्र है। इसके प्रत्येक श्लोक के अंत में “शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे” (अर्थात मैं परम कल्याणकारी, सुखदाता और सर्वेश्वर भगवान शिव की वंदना करता हूँ) का पावन उद्घोष होता है। इस स्तोत्र का नित्य पाठ करने से जीवन के समस्त भय, संकट, रोग और दरिद्रता का नाश होता है।
॥ प्रथम श्लोकः ॥
प्रभुं प्राणनाथं विभुं विश्वनाथं जगन्नाथनाथं सदानन्दभाजम् ।
भवद्भव्यभूतेश्वरं भूतनाथं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ १॥
सरल हिन्दी भावार्थ: जो सबके स्वामी, समस्त प्राणों के आधार, सर्वव्यापक, संपूर्ण विश्व के नाथ, जगन्नाथों के भी नाथ और सदैव परमानंद में लीन रहने वाले हैं; जो भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों कालों के स्वामी तथा समस्त प्राणियों व पंचभूतों के अधिपति हैं—उन परम कल्याणकारी, आनंददाता और सर्वाध्यक्ष भगवान शिव की मैं स्तुति करता हूँ।
॥ द्वितीय श्लोकः ॥
गले रुण्डमालं तनौ सर्पजालं महाकालकालं गणेशाधिपालम् ।
जटाजूटगङ्गोत्तरङ्गैर्विशालं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ २॥
सरल हिन्दी भावार्थ: जिनके गले में मुंडों की माला सुशोभित है, जिनके पावन अंगों पर विषधरों और सर्पों का आभूषण लिपटा है, जो महाकाल के भी काल (मृत्युंजय) हैं, समस्त प्रमथगणों के अधिपति हैं, और जिनकी विशाल जटाओं में पतितपावनी माँ गंगा की उत्तुंग तरंगें क्रीड़ा करती हैं—उन परम कल्याणकारी भगवान शिव की मैं वंदना करता हूँ।
॥ तृतीय श्लोकः ॥
मुदामाकरं मण्डनं मण्डयन्तं महामण्डलं भस्मभूषाधरं तम् ।
अनादिह्यपारं महामोहहारं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ३॥
सरल हिन्दी भावार्थ: जो समस्त आनंद और प्रसन्नता की खान हैं, जो स्वयं आभूषणों को भी सुशोभित करने वाले परम सौंदर्य हैं, जिन्होंने संपूर्ण देह पर पवित्र भस्म को शृंगार रूप में धारण किया है; जो आदि और अंत से परे, अगाध तथा संसार के घोर अज्ञान व महामोह का नाश करने वाले हैं—उन सर्वेश्वर भगवान शिव की मैं वंदना करता हूँ।
॥ चतुर्थ श्लोकः ॥
वटाधोनिवासं महाट्टाट्टहासं महापापनाशं सदासुप्रकाशम् ।
गिरीशं गणेशं महेशं सुरेशं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ४॥
सरल हिन्दी भावार्थ: जो वटवृक्ष की शीतल छाया में (दक्षिणामूर्ति रूप में) निवास करते हैं, जिनका अट्टहास संपूर्ण ब्रह्मांड को गुंजायमान करता है, जो बड़े से बड़े घोर पापों का क्षणमात्र में नाश कर देते हैं और जो सदा अपने ज्ञान के दिव्य प्रकाश से आलोकित हैं; जो कैलासपति (गिरीश), गणों के स्वामी (गणेश), देवाधिदेव (महेश) और देवताओं के भी ईश्वर (सुरेश) हैं—उन कल्याणकारी शंभु की मैं वंदना करता हूँ।
॥ पञ्चम श्लोकः ॥
गिरिन्द्रात्मजासंग्रहीतार्धदेहं गिरौ संस्थितं सर्वदा सन्नगेहम् ।
परब्रह्मब्रह्मादिभिर्वन्ध्यमानं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ५॥
सरल हिन्दी भावार्थ: जिन्होंने गिरिराज हिमवान की पुत्री माँ पार्वती को अपने वाम अंग में धारण कर ‘अर्धनारीश्वर’ स्वरूप ग्रहण किया है, जो पवित्र कैलास पर्वत पर सदैव निवास करते हैं और जिनका धाम परम शांत व निष्कपट है; जो साक्षात परब्रह्म हैं और जिनकी स्तुति ब्रह्मा, विष्णु आदि सभी देवगण नतमस्तक होकर करते हैं—उन सर्वेश्वर शिव की मैं वंदना करता हूँ।
॥ षष्ठ श्लोकः ॥
कपालं त्रिशूलं कराभ्यां दधानं पदाम्भोजनम्राय कामं ददानम् ।
बलीवर्दयानं सुराणां प्रधानं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ६॥
सरल हिन्दी भावार्थ: जो अपने दोनों कर-कमलों में कपाल और दिव्य त्रिशूल धारण किए हुए हैं, जो अपने चरण-कमलों में शीश नवाने वाले अनन्य भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण कर देते हैं; जो वृषभ (नंदी) की सवारी करने वाले और समस्त सुर-वृंद के प्रधान नायक हैं—उन कल्याणदाता भगवान शिव की मैं स्तुति करता हूँ।
॥ सप्तम श्लोकः ॥
शरच्चन्द्रगात्रं गुणानन्द पात्रं त्रिनेत्रं पवित्रं धनेशस्य मित्रम् ।
अपर्णाकलत्रं चरित्रं विचित्रं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ७॥
सरल हिन्दी भावार्थ: जिनका कांतिमान स्वरूप शरद् ऋतु की पूर्णिमा के चंद्रमा के समान उज्ज्वल व शीतल है, जो समस्त सद्गुणों और ब्रह्मानंद के परम पात्र हैं, जो दिव्य त्रिनेत्रधारी, परम पावन और कुबेर (धनेश) के परम सखा हैं; माता अपर्णा (पार्वती) जिनकी अर्धांगिनी हैं और जिनका दिव्य चरित्र अत्यंत रहस्यमय व लीलायुक्त है—उन परमेश्वर शिव की मैं वंदना करता हूँ।
॥ अष्टम श्लोकः ॥
हरं सर्पहारं चिता भूविहारं भवं वेदसारं सदा निर्विकारम् ।
श्मशाने वसन्तं मनोजं दहन्तं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ८॥
सरल हिन्दी भावार्थ: जो भक्तों के समस्त कष्टों को हरने वाले ‘हर’ हैं, सर्पों के हार धारण करने वाले, चिताभूमि में विचरण कर वैराग्य का उपदेश देने वाले, समस्त वेदों के अंतिम सार और सदैव निर्विकार (परिवर्तनहीन) हैं; जो श्मशान में वास करते हुए भी सांसारिक वासनाओं के देवता कामदेव को अपने तीसरे नेत्र से भस्म करने वाले हैं—उन सुखदाता शंभु की मैं वंदना करता हूँ।
॥ नवम श्लोकः (फलश्रुति) ॥
स्तवं यः प्रभाते नरः शूलपाणे पठेत् सर्वदा भर्गभावानुरक्तः ।
स पुत्रं धनं धान्यमित्रं कलत्रं विचित्रं समासाद्य मोक्षं प्रयाति ॥ ९॥
सरल हिन्दी भावार्थ (फलश्रुति): जो मनुष्य नित्य प्रातःकाल उठकर, भगवान शिव के प्रति अनन्य श्रद्धा व भक्तिभाव से युक्त होकर त्रिशूलधारी महादेव के इस पावन अष्टक का पाठ करता है, वह इस लोक में सुयोग्य संतान, विपुल धन-धान्य, सच्चे व निष्कपट मित्र, अनुकूल जीवनसंगिनी और समस्त भौतिक सुखों को प्राप्त कर अंत में भगवान शिव के परम मोक्ष धाम को प्राप्त करता है।
॥ इति श्री शिवाष्टकं सम्पूर्णम् ॥