हिंदू कथाएं
समुद्र मंथन की कथा — 14 रत्नों, कालकूट विष एवं अमृत प्राकट्य का रहस्य
देव-दानव मंथन — क्षीरसागर से निकले 14 दिव्य रत्नों का गहरा आध्यात्मिक दर्शन
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समुद्र मंथन की कथा — 14 रत्नों, कालकूट विष एवं अमृत प्राकट्य का रहस्य
लक्ष्मीः कौस्तुभपारिजातकसुरा धन्वन्तरिश्चन्द्रमाः।
गावः कामदुहा सुरेश्वरगजो रम्भादिदेवाङ्गनाः॥
अश्वः सप्तमुखो विषं हरिधनुः शङ्खोऽमृतं चाम्बुधेः।
रत्नानीह चतुर्दश प्रतिदिनं कुर्वन्तु वो मङ्गलम्॥
गावः कामदुहा सुरेश्वरगजो रम्भादिदेवाङ्गनाः॥
अश्वः सप्तमुखो विषं हरिधनुः शङ्खोऽमृतं चाम्बुधेः।
रत्नानीह चतुर्दश प्रतिदिनं कुर्वन्तु वो मङ्गलम्॥
14 रत्न श्लोक: लक्ष्मी, कौस्तुभ मणि, पारिजात, वारुणी (सुरा), धन्वन्तरि, चंद्रमा, कामधेनु, ऐरावत हाथी, रंभा आदि अप्सराएं, उच्चैःश्रवा घोड़ा, कालकूट विष, शारंग धनुष, पांचजन्य शंख और अमृत कलश—ये 14 रत्न आपका कल्याण करें।
🌊 समुद्र मंथन का पौराणिक प्रसंग
महर्षि दुर्वासा के शाप से जब देवराज इंद्र श्रीहीन हो गए और असुरों ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया, तब भगवान विष्णु की आज्ञा से अमृत प्राप्ति के लिए देवों और दानवों ने क्षीरसागर का मंथन किया। मंदराचल पर्वत को मथानी और नागराज वासुकि को नेती (रस्सी) बनाया गया। भगवान विष्णु ने कच्छप (कूर्म) अवतार धारण कर पर्वत को अपनी पीठ पर सहारा दिया।
🔱 मंथन का गहरा मनोवैज्ञानिक अर्थ
समुद्र मंथन वास्तव में मानव मन का मंथन है। जब व्यक्ति साधना प्रारंभ करता है, तो सबसे पहले भीतर का द्वेष और वासना रूपी कालकूट विष निकलता है। जिसे केवल शिव (वैराग्य) ही कंठ में धारण कर सकते हैं। इसके बाद जब इंद्रियां और मन निर्मल होते हैं, तब अंत में कामधेनु, लक्ष्मी, शंख और अंततः अमरत्व रूपी अमृत की प्राप्ति होती है।