हिंदू कथाएं
भक्त ध्रुव की कथा — बाल ध्रुव की अटूट तपस्या, नारद उपदेश एवं ध्रुव तारा
पांच वर्ष के बालक का दृढ संकल्प — जिसे भगवान ने दिया ब्रह्मांड में अटल स्थान
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भक्त ध्रुव की कथा — बाल ध्रुव की अटूट तपस्या, नारद उपदेश एवं ध्रुव तारा
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
द्वादशाक्षर महामंत्र: देवर्षि नारद द्वारा बालक ध्रुव को दिया गया यह पावन मंत्र आज भी संसार के समस्त साधकों को परमात्मा का साक्षात्कार कराने वाला सिद्ध महामंत्र है।
👑 पिता की गोद से अपमान और वन गमन
राजा उत्तानपाद की दो रानियां थीं—सुनीति और सुरुचि। राजा सुरुचि और उसके पुत्र उत्तम से अधिक स्नेह करते थे। एक दिन पांच वर्ष के ध्रुव जब पिता की गोद में बैठे, तो सौतेली माता सुरुचि ने उनका हाथ पकड़कर उतार दिया और कटु वचन कहे: “यदि राजा की गोद में बैठना है, तो भगवान नारायण की तपस्या कर और मेरी कोख से जन्म ले।” रोते हुए ध्रुव जब अपनी जन्मदात्री माता सुनीति के पास पहुंचे, तो माता ने कहा: “बेटा! सौतेली मां ने कटु कहा पर मार्ग सही दिखाया। संसार के राजा की गोद न सही, तुम जगत के परमपिता भगवान नारायण की गोद प्राप्त करो।”
🌟 मधुवन में घोर तप और अमर पद
मार्ग में देवर्षि नारद ने बालक की परीक्षा ली, परंतु ध्रुव का संकल्प अडिग था। नारद जी ने उन्हें यमुना तट पर मधुवन में द्वादशाक्षर मंत्र का उपदेश दिया। ध्रुव ने पहले फल, फिर जल, फिर वायु पीकर और अंत में श्वास रोककर एक पैर पर खड़े होकर ऐसी घोर तपस्या की कि तीनों लोक डोल उठे। भगवान विष्णु ने साक्षात प्रकट होकर ध्रुव को स्पर्श किया और उन्हें ध्रुव लोक (अटल ध्रुव तारा) प्रदान किया, जिसके चारों ओर संपूर्ण सप्तर्षि और नक्षत्र परिक्रमा करते हैं।