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भगवान शिव — स्वरूप, त्रिशूल-डमरू का रहस्य एवं पावन 108 नाम
सनातन धर्म के देवाधिदेव महादेव — कल्याण, वैराग्य और चेतना के शाश्वत स्रोत
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भगवान शिव — स्वरूप, त्रिशूल-डमरू का रहस्य एवं पावन 108 नाम
शान्तं पद्मासनस्थं शशधरमुकुटं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम्।
शूलं वज्रं च खड्गं परशुमभयदं दक्षिणाङ्गे वहन्तम्॥
नागं पाशं च घण्टां प्रलयहुतवहं साङ्कुशं वामभागे।
नानालङ्कारयुक्तं स्फटिकमणिनिभं पार्वतीशं नमामि॥
शूलं वज्रं च खड्गं परशुमभयदं दक्षिणाङ्गे वहन्तम्॥
नागं पाशं च घण्टां प्रलयहुतवहं साङ्कुशं वामभागे।
नानालङ्कारयुक्तं स्फटिकमणिनिभं पार्वतीशं नमामि॥
🔱 भगवान शिव के प्रतीकों का आध्यात्मिक विज्ञान
- त्रिशूल: त्रिगुण (सत्व, रज, तम) और त्रिकाल (भूत, वर्तमान, भविष्य) पर नियंत्रण का प्रतीक।
- डमरू: ॐ कार का अनाहत नाद, जिससे सृष्टि की उत्पत्ति और छंद शास्त्र का जन्म हुआ।
- चंद्रमा: मन की एकाग्रता, शीतलता और समय चक्र का प्रतीक।
- गंगा: ज्ञान की पवित्र धारा जो चेतना को निर्मल करती है।
- सर्प (वासुकी): कुंडलिनी शक्ति और मृत्यु-भय पर विजय का प्रतीक।
- भस्म: इस नश्वर संसार की क्षणभंगुरता और वैराग्य का प्रतीक।
- तीसरा नेत्र: विवेक और ज्ञान का चक्षु जो काम और अज्ञान को भस्म करता है।
🌸 भगवान शिव के प्रमुख नाम एवं आराधना
शिव का अर्थ ही है “कल्याण”। जो नित्य कल्याणकारी है, वह शिव है। वे आशुतोष (अतिशीघ्र प्रसन्न होने वाले), भोलेनाथ, पशुपतिनाथ, महाकाल और नटराज हैं। शिवलिंग की आराधना परब्रह्म के निराकार और साकार दोनों स्वरूपों का एक साथ पूजन है।