योग एवं आध्यात्म
योग का परिचय — महर्षि पतंजलि का अष्टांग योग एवं 'चित्त-वृत्ति निरोध' का विज्ञान
शारीरिक स्वास्थ्य से समाधि तक — आत्मा का परमात्मा से मिलन कराने वाला अष्टांग मार्ग
BHARTIYADOOT.COM • धर्म • संस्कृति • हमारी पहचान
卐 ॐ 卐
योग का परिचय — महर्षि पतंजलि का अष्टांग योग एवं 'चित्त-वृत्ति निरोध' का विज्ञान
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।
तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्॥
तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्॥
पतंजलि योगसूत्र (1.2-3): चित्त की वृत्तियों (मन के चंचल विचारों और तरंगों) का पूर्णतः शांत हो जाना ही योग है। जब वृत्तियां शांत होती हैं, तब आत्मा अपने वास्तविक दिव्य स्वरूप में स्थित हो जाती है।
🧘 अष्टांग योग के आठ पावन अंग
महर्षि पतंजलि ने मानव चेतना के विकास के लिए 8 क्रमिक सोपानों का प्रतिपादन किया:
- १. यम (Social Ethics): अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह (अनावश्यक संचय न करना)।
- २. नियम (Personal Discipline): शौच (पवित्रता), संतोष, तप, स्वाध्याय (सद्ग्रंथों का अध्ययन), ईश्वर प्राणिधान (समर्पण)।
- ३. आसन (Physical Postures): “स्थिरसुखमासनम्” — शरीर को स्थिर और सुखाकारी बनाना।
- ४. प्राणायाम (Breath Control): श्वास-प्रश्वास की गति पर नियंत्रण कर प्राण ऊर्जा का विस्तार।
- ५. प्रत्याहार (Sense Withdrawal): इंद्रियों को बाह्य विषयों से समेटकर अंतर्मुखी करना।
- ६. धारणा (Focused Concentration): चित्त को किसी एक लक्ष्य (जैसे आज्ञा चक्र या इष्टदेव) पर एकाग्र करना।
- ७. ध्यान (Meditation): एकाग्रता का अखंड, निर्बाध प्रवाह (जैसे तेल की अखंड धार)।
- ८. समाधि (Ultimate Absorption): ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद मिटकर परमात्मा में विलीन हो जाना।
🌟 योग केवल कसरत नहीं, जीवन जीने की कला है
आज पश्चिमी जगत ने योग को केवल शारीरिक व्यायाम तक सीमित कर दिया है, जबकि सनातन योग मन, प्राण और आत्मा के शोधन का आध्यात्मिक विज्ञान है। अष्टांग योग का पालन करने से मनुष्य तनाव-मुक्त, ओजस्वी और आत्मज्ञानी बनता है।