संत एवं ऋषि
भक्त कवि संत सूरदास — वात्सल्य रस के सम्राट, अष्टछाप एवं कृष्ण भक्ति के अमर पद
प्रज्ञाचक्षु महाकवि — जिन्होंने बंद आंखों से बाल गोपाल के अलौकिक सौंदर्य का साक्षात्कार किया
BHARTIYADOOT.COM • धर्म • संस्कृति • हमारी पहचान
卐 ॐ 卐
भक्त कवि संत सूरदास — वात्सल्य रस के सम्राट, अष्टछाप एवं कृष्ण भक्ति के अमर पद
मैया कबहिं बढ़ैगी चोटी।
किती बार मोहिं दूध पियत भइ, यह अजहूं है छोटी॥
सूर स्याम चिरजीवौ दोउ भैया, हरि हलधर की जोटी॥
किती बार मोहिं दूध पियत भइ, यह अजहूं है छोटी॥
सूर स्याम चिरजीवौ दोउ भैया, हरि हलधर की जोटी॥
सूरदास वात्सल्य पद: बाल कृष्ण माता यशोदा से बाल-सुलभ शिकायत करते हैं कि मैया! मेरी चोटी कब बढ़ेगी? तुमने कहा था कि दूध पीने से यह बलराम भैया जैसी लंबी हो जाएगी, पर यह तो आज भी वैसी ही छोटी है।
🦚 महाप्रभु वल्लभाचार्य का शिष्यत्व एवं पुष्टिमार्ग
रुनकता (मथुरा-आगरा) में जन्मे सूरदास जन्मांध थे। परंतु उनकी भीतरी आंखें दिव्य चेतना से प्रकाशित थीं। गऊघाट पर जब महाप्रभु वल्लभाचार्य से उनकी भेंट हुई, तो गुरु ने कहा: “सूर ह्वै कै ऐसो घिघियात काहे कौ है, कछु भगवत्-लीला गाउ।” इसके बाद सूरदास जी पुष्टिमार्ग में दीक्षित हुए और श्रीनाथ जी के मंदिर में कीर्तनकार के रूप में अष्टछाप के प्रमुख कवि बने।
🌟 सूरसागर और भ्रमरगीत
सूरदास जी ने सूरसागर, सूरसारावली और साहित्य-लहरी की रचना की। उनके ‘भ्रमरगीत’ प्रसंग में गोपियों और ज्ञानी उद्धव का संवाद ज्ञान पर प्रेम और भक्ति की विजय का सनातन प्रमाण है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ठीक ही कहा: “वात्सल्य और शृंगार के क्षेत्र में सूरदास ने जितना लिखा, उतना संसार का कोई अन्य कवि नहीं लिख सका।”