सनातन धर्म ज्ञान
मोक्ष की अवधारणा — जीवन का परम लक्ष्य, जन्म-मरण से मुक्ति एवं परमानंद
अविद्या और बंधनों की निवृत्ति — सच्चिदानंद परमात्मा में एकाकार होने की स्थिति
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मोक्ष की अवधारणा — जीवन का परम लक्ष्य, जन्म-मरण से मुक्ति एवं परमानंद
न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
कठोपनिषद वचन: यह ज्ञानी आत्मा न कभी जन्म लेता है और न मरता है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के नष्ट होने पर भी यह कभी नष्ट नहीं होता।
🕊️ मोक्ष के चार प्रकार (सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायुज्य)
भक्ति और वेदांत में मोक्ष की चार प्रमुख अवस्थाएं बताई गई हैं:
- सालोक्य: भगवान के दिव्य धाम (वैकुंठ, गोलोक, शिवलोक) में निवास प्राप्त करना।
- सामीप्य: परमात्मा के अत्यंत निकट रहकर उनकी नित्य सेवा और सान्निध्य का आनंद पाना।
- सारूप्य: भगवान के समान दिव्य रूप और गुणों को प्राप्त करना।
- सायुज्य (कैवल्य): जीवात्मा का परमात्मा में पूर्णतः लीन हो जाना, जैसे नदी समुद्र में मिलकर समुद्र ही बन जाती है।
🌟 मोक्ष प्राप्ति के 4 सनातन मार्ग
सनातन धर्म में साधक की रुचि और स्वभाव के अनुसार चार मार्ग हैं: ज्ञान योग (विवेक और आत्म-विचार), भक्ति योग (ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम और शरणागति), कर्म योग (निस्वार्थ भाव से लोक-कल्याण), और राज योग (अष्टांग योग और समाधि)।