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श्रीमद्भगवद्गीता — परिचय, दर्शन एवं सम्पूर्ण 18 अध्यायों का सार

सम्पूर्ण आरती, हिन्दी भावार्थ एवं नित्य पूजा विधि

सर्वोच्च धर्मग्रंथ

श्रीमद्भगवद्गीता: जीवन का शाश्वत मार्गदर्शक

महाभारत के भीष्म पर्व का अंग श्रीमद्भगवद्गीता कुरुक्षेत्र के धर्मयुद्ध में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा विषादग्रस्त अर्जुन को दिया गया साक्षात ब्रह्मज्ञान है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ (२.४७)
भावार्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए कर्मफल के कर्ता मत बनो और तुम्हारी आसक्ति अकर्म (कर्म न करने) में भी न हो।

गीता के तीन प्रमुख योग

  • कर्मयोग (अध्याय ३-५): निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करना और कर्मफल को ईश्वर को समर्पित करना।
  • भक्तियोग (अध्याय ७-१२): अनन्य प्रेम, श्रद्धा और समर्पण के साथ परमात्मा की भक्ति में लीन होना।
  • ज्ञानयोग (अध्याय १३-१८): आत्मा और परमात्मा के अद्वैत संबंध, प्रकृति और पुरुष के विवेक का साक्षात्कार।

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